कंज्यूमर खबर

बाल उपभोक्ता…हृत्वी का छोटा भीम तो अभिराम का मोटू-पतलू……!

नोएडा में रहने वाली 6 साल की हृत्वी शहर के एक नामी स्कूल में पढ़ती है। पढ़ाई मे वो खासी तेज है। स्कूल से मिला होमवर्क करने में वो कभी कोताही नहीं करती लेकिन जैसे ही उसे  समय मिलता है

 

बच्चों के तौर-तरीकों पर कार्टूनों का गहरा असर

भाषा हो या अनुशासन बच्चों पर गहरा प्रभाव

नई दिल्ली, कंज्यूमर खबर। नोएडा में रहने वाली 6 साल की हृत्वी शहर के एक नामी स्कूल में पढ़ती है। पढ़ाई मे वो खासी तेज है। स्कूल से मिला होमवर्क करने में वो कभी कोताही नहीं करती लेकिन जैसे ही उसे  समय मिलता है तो उसका एकमात्र शौक टीवी  के सामने बैठ जाना है और अपने मनपसंद कार्टून का मजा लेना है। खेलने-कूदने में उसकी दिलचस्पी न के बराबर है।

हृत्वी जैसा ही हाल अभिराम का है। उनकी उम्र तो और कम है। दो-ढाई साल लेकिन खाना बिना कार्टून  के खाने के का सवाल ही नहीं उठता। मां-बाप परेशान हैं लेकिन चाह कर भी कुछ कर नहीं सकते क्योंकि लत तो उन्ही की लगाई हुई है।

खैर, हृत्वी और अभिराम की कहानी हर घर के बच्चों की कहानी है। आधुनिक भारत में बच्चों की दुनिया तेज़ी से बदल रही है। जहाँ पहले बच्चों का बचपन मिट्टी के खिलौनों, गलियों के खेल, लोककथाओं और दादी-नानी की कहानियों में बीतता था, वहीं आज का बचपन स्क्रीन के चारों ओर सिमटता जा रहा है। टेलीविजन, मोबाइल फोन, टैबलेट और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों के मनोरंजन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। इस बदले हुए परिदृश्य में कार्टून बच्चों के सबसे प्रिय और प्रभावशाली साथी बन चुके हैं।

कार्टून अब केवल हँसी-मज़ाक या समय बिताने का साधन नहीं रहे। वे बच्चों की भाषा, सोच, व्यवहार, आदतों, रुचियों और यहाँ तक कि उनके सपनों को भी आकार देने लगे हैं। भारत जैसे सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों से भरपूर देश में बच्चों को लुभाने वाले कार्टूनों की भूमिका इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

बच्चों को कार्टून पसंद क्यों ?  

बच्चों का मन स्वभाव से ही चंचल, जिज्ञासु और कल्पनाशील होता है। कार्टून इस स्वभाव को सीधे छूते हैं। चमकीले रंग, तेज़ गति, मज़ेदार आवाज़ें और सरल कथानक बच्चों को तुरंत आकर्षित कर लेते हैं। कार्टूनों की दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं होता—जानवर बोलते हैं, बच्चे उड़ते हैं, जादू से समस्याएँ हल हो जाती हैं और हर कहानी का अंत रोमांच से भरा होता है।

कार्टून पात्र अक्सर बच्चों जैसे ही होते हैं—शरारती, जिज्ञासु, कभी डरपोक तो कभी साहसी। बच्चे स्वयं को इन पात्रों में देखने लगते हैं और उनसे भावनात्मक जुड़ाव बना लेते हैं। यही कारण है कि एक ही कार्टून एपिसोड को बच्चे बार-बार देखने में भी ऊबते नहीं हैं।

भारत में कार्टून संस्कृति

भारत में कार्टूनों का इतिहास अपेक्षाकृत नया है। शुरुआती दौर में भारतीय बच्चे मुख्यतः विदेशी कार्टूनों पर निर्भर थे। धीरे-धीरे भारतीय एनीमेशन उद्योग ने अपनी पहचान बनानी शुरू की। आज भारत में न केवल कार्टून देखे जाते हैं, बल्कि बनाए भी जा रहे हैं, और वे बच्चों को लुभाने में पूरी तरह सक्षम हैं।

भारतीय कार्टूनों की खासियत यह है कि वे स्थानीय संस्कृति, भाषा, परिवेश और मूल्यों से जुड़े होते हैं। गाँव, परिवार, दोस्ती, त्योहार और पौराणिक कथाएँ इन कार्टूनों में प्रमुखता से दिखाई देती हैं, जिससे बच्चे अपने आसपास की दुनिया से जुड़ाव महसूस करते हैं।

भारत में बच्चों के पसंदीदा कार्टून

भारतीय कार्टून

छोटा भीम…छोटा भीम भारतीय कार्टून जगत का सबसे प्रसिद्ध नाम है। इसकी कहानी ढोलकपुर नामक काल्पनिक गाँव में आधारित है, लेकिन इसके मूल्य पूरी तरह भारतीय हैं। भीम का साहस, बल, न्यायप्रियता और मित्रों के प्रति समर्पण बच्चों को प्रेरित करता है। यह कार्टून बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है।

मोटू-पतलू…यह हास्य प्रधान कार्टून बच्चों में अत्यंत लोकप्रिय है। मोटू और पतलू की दोस्ती, उनकी मज़ेदार समस्याएँ और सरल समाधान बच्चों को हँसाते भी हैं और यह भी सिखाते हैं कि मुश्किल समय में दोस्त साथ देते हैं।

शिवा…शिवा एक आम भारतीय बच्चे का प्रतिनिधित्व करता है, जो असाधारण साहस और बुद्धिमत्ता के बल पर अपराध से लड़ता है। यह कार्टून बच्चों में आत्मविश्वास, सतर्कता और जिम्मेदारी की भावना पैदा करता है।

लिटिल कृष्णा, बाल गणेश, हनुमान…ये कार्टून भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। इनके माध्यम से बच्चे अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से परिचित होते हैं। ये कार्टून नैतिक मूल्यों, भक्ति, साहस और सत्य का महत्व बताते हैं।

विदेशी कार्टून

डोरेमॉन…जापान का यह कार्टून भारत में बेहद लोकप्रिय है। डोरेमॉन के जादुई गैजेट्स बच्चों को आकर्षित करते हैं, लेकिन कई बार यह बच्चों में अव्यावहारिक अपेक्षाएँ भी पैदा करता है।

शिनचैन…यह कार्टून अपने शरारती और कभी-कभी अभद्र व्यवहार के कारण विवादों में रहा है। कुछ अभिभावक इसे बच्चों के लिए अनुचित मानते हैं।

 

टॉम एंड जेरी, पोकेमॉन, बेन 10…ये कार्टून रोमांच, हास्य और एक्शन से भरपूर हैं और बच्चों को लंबे समय तक बाँधे रखते हैं। मनोवैज्ञानिक शुचि कुमार का कहना है कि, बच्चों पर कार्टूनों का गहरा असर पड़ता है। कई बार वो मानसिक तौर पर कार्टूनों के लती हो जाते हैं और उनके बर्ताव से लेकर भाषा तक में उन कार्टूनों के झलक मिलती है जिसे वे पसंद करते हैं।

कार्टूनों का बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव

शुचि कुमार के अनुसार, यदि कार्टूनों का चयन सही ढंग से किया जाए और देखने का समय सीमित रखा जाए, तो उनके कई सकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। सबसे पहला तो, बच्चों में कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता का विकास होता है। कार्टून बच्चों को नई-नई कल्पनाएँ करने सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। दूसरा, बच्चों  की भाषा और अभिव्यक्ति में सुधार होता है। बच्चे नए शब्द, संवाद शैली और भाव-भंगिमा सीखते हैं।

उनका कहना है कि, इसके अलावा बच्चों में नैतिकता का विकास भी होता है। दोस्ती, ईमानदारी, साहस, सहयोग और सच्चाई जैसे गुण कई कार्टूनों में दिखाए जाते हैं। कार्टूनों के जरिए बच्चों का मनोरंजन भी होता है। कार्टून बच्चों को हँसाते हैं, जिससे तनाव कम होता है। इसके साथ ही, बच्चों का अपनी संस्कृति से जुड़ाव भी होता है। भारतीय कार्टून बच्चों को अपनी परंपराओं और मूल्यों से जोड़ते हैं।

बच्चों पर उलटा असर

शुचि कुमार कार्टूनों के नकारात्मक असर के बारे में भी बताती हैं। वे कहती हैं कि, कार्टूनों के दुष्प्रभाव भी कम गंभीर नहीं हैं,  विशेषकर जब बच्चे बिना नियंत्रण के लंबे समय तक उन्हें देखते हैं। वे बताती हैं कि, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में आँखों की समस्या, नींद की कमी और शारीरिक निष्क्रियता बढ़ती है। उनका व्यवहार हिंसक और आक्रामक हो सकता है। एक्शन और मार-धाड़ वाले कार्टून बच्चों को आक्रामक बना सकते हैं। उनमें अनुशासनहीनता बढ़ सकती है। शरारती पात्रों की नकल बच्चे वास्तविक जीवन में करने लगते हैं। वे आगे बताती हैं कि कार्टूनों से बच्चों में काल्पनिकता बढ़ जाती है और बच्चे वास्तविक जीवन की समस्याओं से भागने लगते हैं। इसके साथ बच्चें पढ़ाई और खेल-कूद से दूरी बनाने लगते हैं। कार्टून की लत बच्चों को किताबों और खेलकूद से दूर कर देती है।

माता-पिता और टीचर क्या करें ?

कार्टूनों के प्रभाव को संतुलित करने में अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम है।

सबसे पहले को  बच्चों के लिए कार्टून देखने की समय सीमा तय की जानी चाहिए और उम्र और मानसिक स्तर के अनुसार उपयुक्त कार्टून चुनने चाहिए। माता-पिता या जो भी मौजूद हो कोशिशश करे कि बच्चों के साथ बैठकर कार्टून देखा जाए और बच्चों को उनके संदेश समझाने का प्रयास किया जाए।

कोशिश करनी चाहिए कि, बच्चों को खेल, किताबें, कला और संवाद के लिए प्रोत्साहित किया जाए।  बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि कार्टून कल्पना हैं,  वास्तविकता नहीं।

भारतीय एनीमेशन उद्योग की भी जिम्मेदारी

 

आज भारतीय एनीमेशन उद्योग तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उसकी जिम्मेदारी केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों के लिए बनने वाली सामग्री में नैतिकता, संस्कृति, संवेदनशीलता और सामाजिक मूल्यों का समावेश आवश्यक है। कार्टून भविष्य की पीढ़ी को गढ़ते हैं, इसलिए उनका उद्देश्य केवल लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज निर्माण भी होना चाहिए।

भारत में बच्चों को लुभाने वाले कार्टून आधुनिक बचपन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। वे बच्चों के मित्र भी हैं और शिक्षक भी। कार्टून न तो पूरी तरह अच्छे हैं और न ही पूरी तरह बुरे—उनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें कैसे और कितना देखा जा रहा है। यदि अभिभावक, शिक्षक, समाज और कार्टून निर्माता मिलकर संतुलन बनाएँ, तो कार्टून बच्चों के सर्वांगीण विकास का सशक्त माध्यम बन सकते हैं। जरूरत इस बातकी है कि हम कार्टूनों को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का माध्यम बनाएँ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button