संपादकीय

कर्ज नहीं, किसान को सक्षमता चाहिए

देश के कई राज्यों में किसानों के कर्ज माफ करने का दौर चल रहा है। कर्ज माफी को लेकर कई जगह किसान आंदोलित भी हैं। उनके आंदोलन को राजनीतिक हवा भी मिल रही है। किसानों की दलील है कि उनकी खेती अब मुनाफे का सौदा नहीं रही। उनके लिए अपनी लागत निकाल पाना भी मुश्किल हो रहा है। बैंक से लिया कर्ज कहां से चुकाया जाएगा उसे पता नहीं। सरकार हर बार की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात तो करती है लेकिन किसान से उसकी उपज खऱीदने के लिए उसके पास वक्त नहीं है, संसाधन नहीं हैं। थक-हार कर किसान खुले बाजार पर ही निर्भर रहता है और उसके क्रूर प्रपंचों का शिकार होता है। हो सकता है कर्ज माफी से किसान को फौरी तौर पर कुछ राहत मिल भी जाए लेकिन क्या कर्ज माफी किसानों की समस्या का स्थायी हल हो सकता है ?
सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि किसानों की कर्ज माफी के लिए पैसा राज्य सरकारें अपने संसाधनों से जुटाएं केंद्र सरकार इसमें कोई मदद नहीं करेगी। दरअसल, किसानों की कर्ज माफी उनकी समस्या का हल नहीं है। अगर ऐसा होता तो कर्ज माफी के बाद भी कई राज्यों में किसानों की आत्महत्याएं बढी हैं। ऐसा क्यों? यह एक विचारणीय प्रश्न है।

हमारे देश में खेती करने वाले अधिकतर वे किसान हैं जिनका खेत पर मालिकाना हक नहीं होता। वे खेती बंटाई या अधिया पर करते हैं। खेत का मालिक कोई और होता है। खेतिहर किसान और खेत मालिक के बीच उपज की लागत को आधा -आधा बांट लेने का समझौता होता है। खेत में बीज, पानी, खाद से लेकर कटाई- ढुलाई तक सब खेतिहर के जिम्मे। खेत मालिक को तो बस मुनाफे में हिस्सा चाहिए। अब यह सोचने की बात है कि जिस किसान के पास अपनी खुद की जमीन नहीं उसे कोई बैंक क्यों और किसलिए कर्ज देगा ?
दरअसल, किसान के नाम पर सारा खेल यहीं से शुरू होता है। जिसका खेत होता है वही बैंक से कर्ज लेता है और तमाम सरकारी छूट और सुविधाओं का फायदा उठाता है। खेतिहर किसान तो खेती -किसानी के लिए कर्ज लेता है साहूकारों से, बड़े किसानों से और उसकी जिंदगी बीत जाती है उसे चुकाने में। नहीं चुका पाता तो कई बार जिंदगी से ही मुंह मोड़ने का फैसला कर बैठता है।
सरकार का ध्यान उस किसान पर होना चाहिए जो वास्तव में खेती करता है। उसे मदद की जरूरत है। सबसे पहले तो जिस खेत में वह खेती करता है, भले ही वह उसका न हो लेकिन उसे फसल बीमा से लेकर कृषि कार्यों के लिए मिलने वाली हर सुविधा का हकदार बनाना होगा। दूसरा, सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को हर वर्ष नए सिरे से घोषित करना होगा, खेती में उपज लागत और किसान के मुनाफे को ध्नान में रखते हुए। तीसरा, न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर उपज की खरीद न हो इसके लिए एक चुस्त निगरानी तंत्र की भी आवश्कता है। चौथी और सबसे अहम बात, बैंकों को किसानों को कर्ज देते समय यह ध्यान रखना होगा कि वे कर्ज किसे दे रहे हैं वास्तविक किसान को या कि खेत के मालिक को। इसके लिए एक तंत्र विकसित करने की जरूरत है। सरकार ने नई फसल बीमा योजना में इस बात के प्रावधान करने के प्रयास किए हैं कि वास्तविक खेतिहर को फसल बीमा से जोड़ा जा सके।
कर्ज माफी जैसे फैसले कई बार राजनीतिक मजबूरी का परिणाम होते हैं। लेकिन ये मजबूरी कहीं ऐसी न हो जाए कि अर्थ व्यवस्था की रीढ़ को ही तोड़ दे। कर्ज माफी की घोषणा के बाद भी सरकार को यह देखना होगा कि उसके इस फैसले का लाभ वास्तव में जो खेतिहर है उसे ही मिले न कि उसके नाम पर दलाली करने वाले किसानों को उसका फायदा मिले। किसान को इस तरह से सक्षम बनाने की जरूरत है ताकि वह अपनी मदद खुद करने में सक्षम बन सके। ऐसा हो गया तो किसान कर्ज देगा, कर्ज मांगेगा नहीं।

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