
दिल्ली का हाल-बेहाल है। दिल्ली की सांसों पर पहरा लगा है। प्रदूषण ने दिल्ली का दम निकाल रखा है। यमुना नदी फेन फेंक रही है। उसे भी सांस लेने में दिक्कत है। दिल्ली की सड़कों पर वाहन रेंग रहे हैं क्योंकि पब्लिक ट्रांसपोर्ट नाकाफी है।
दिल्ली में प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठक होती है। समाधान के लिए तय क्या होता है? दिल्ली की सड़कों पर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स बढ़ाए जाएं। मु्ख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पीडब्लूडी की 200 बसों को 45 दिनों में दिल्ली में धूल नियंत्रण के लिए काम पर लगाया है।
बीजेपी नेता और पॉंडिचेरी की पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर किरण बेदी ने एक ट्वीट में दिल्ली के दमघोंटू पर्यावरण पर बड़ी तल्ख टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि, इस समय पीएम, सीएम, मेयर सब दिल्ली के हैं। फिर दिल्ली का ऐसा हाल क्यों है। उन्होंने कहा कि, पहले मैं पॉंडिचेरी में थी तो मुझे दिल्ली की स्थिति का अंदाजा नहीं था। अब मैं खुद दिल्ली नें रहती हूं तो मुझे अंदाजा है कि स्थिति कैसी है ? उनके इस बयान को किसी विरोधी दल के नेता ने दिया होता तो शायद राजनीति की बात होती लेकिन जब आरोप अपनी ही पार्टी के नेता ने लगाया है तो दिल्ली सरकार ने चुप्पी साध ली।
अब थोड़ा पीछे लौटते हैं। दिवाली के बाद यमुना कितनी खस्ताहाल है यह बताने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज यमुना किनारे जल परीक्षण करते नजर आए। दिल्ली में प्रदूषण पर दिल्ली सरकार की बाजीगरी को भी उन्होंने एक्यूआई दिखाने वाले मीटरों के पास की फिल्म बना कर उजागर किया।
कांग्रेस की तो बात ही निराली है। उसके नेता दिल्ली के प्रदूषण के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर और मास्क के साथ प्रेस कॉंफ्रेंस करते दिखे।
यह तो हुई राजनीतिक दलों की कहानी, लेकिन, इस कहानी में एक पेंच भी है। यह पेंच ऐसा है जो इस सारे उपक्रम के लिए कहीं न कहीं केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करता है।
आपको ध्यान होगा कि, दिल्ली में कुछ समय पहले तक एक लेफ्टिनेंट गवर्नर हुआ करते थे नाम है विनय कुमार सक्सेना। वैसे वो अब भी दिल्ली के पदेन लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं लेकिन अब वो पहले वाली बात नहीं। वे अब दिल्ली की सड़कों पर दिल्ली सरकार के कामकाज की निगरानी करते नहीं दिखते। सरकार के कामकाज पर सवाल नहीं उठाते। मुख्यमंत्री कार्यालय की फाइलों को नहीं रोकते। यमुना का जल परीक्षण नहीं करते। दिल्ली की शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन उन्हें सब दुरुस्त और चंगा दिखता है। ये वही गवर्नर साहब हैं जिनके पर सुप्रीम कोर्ट ने कतरे तो केंद्र सरकार ने कानून बना कर उन्हें ताकत दी।
दिल्ली के राजपथ के सवाल तब भी वही थे जो आज हैं। दिल्ली का पानी, दिल्ली की हवा, दिल्ली में शिक्षा, परिवहन, सुरक्षा, यातायात रिहाइश आदि- अनादि। दिल्ली को इन सवालों का जवाब कभी नहीं मिला। सरकारें किसी की भी रही हो, जवाब किसी ने देने की कोशिश नहीं की।
पिछले 15 सालों को लेते हैं। कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की सरकार थी। दिल्ली वाले और यहां तक कि बीजेपी वाले भी मानते हैं कि शीला दीक्षित की सरकार में दिल्ली के लिए शायद वह कुछ हुआ जो अब तक कोई नहीं कर पाया। दिल्ली की सड़कों से रेड लाइन बसें हटीं, ब्लू लाइन बसें फेज़ आउट हुई, सीएनजी बसें लाई गईं, मेट्रों आई, फ्लाईओवर बने। दिल्ली काफी-कुछ बदली।
फिर आई आम आदनी पार्टी की सरकार, एक दशक से ज्यादा इसी पार्टी की सरकार रही। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में कई तरह के नए प्रयोग करने की कोशिश की। सरकारी स्कूलों के आधुनिकीकरण से लेकर मोहल्ला क्लीनिकों तक कई नई पहलें की गई। प्रदूषण बढ़ा तो ऑड-इवेन को आजमाया गया। बाद में भ्रष्टाचार की कई आरोप लगे और केजरीवाल सरकार की बिदाई हो गई।
अरविंद केजरीवाल सरकार की एक बड़ी त्रासदी रही केंद्र में बीजेपी की सरकार। बीजेपी दिल्ली सरकार की गद्दी पर बैठने के लिए काफी समय से आतुर थी। नतीजा हमेशा, केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव के रूप में सामने आया। केजरीवाल आरोप लगाते रहे कि उन्हें काम नहीं दिया जा रहा। दिल्ली सरकार से पास की गई फाइलें लेफ्टिनेंट गर्वनर के पास जाने लगीं और वे केद्र सरकार के इशारे पर ही पास होती थी। मामला इस कदर बिगड़ा कि सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनी हुई सरकार को ताकत देनी चाही तो केंद्र सरकार ने नया कानून ही बना दिया। चुनी हुई सरकार के हाथ से ताकत निकल कर लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथ में चली गई। एलजी ने आएदिन निर्वाचित सरकार के कामकाज में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए। कभी दिल्ली की सड़कों पर मुआयना करने निकल पड़ते, कभी यमुना का जल परीक्षा करते तो कभी प्रदूषण पर केजरीवाल सरकार को घेरते। सरकारी काम कामकाज की समीक्षा तो होती ही रहती थी। कुल मिलाकर वे एक ‘अति सक्रिय’ लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में पहचान तो रखते थे लेकिन उन पर आऱोप था कि उनकी इस सक्रितया के पीछे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार थी।
सरकार बदली, दिल्ली में बीजेपी की सरकार बन गई। विनय कुमार सक्सेना अब भी दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं। दिल्ली का हाल और खस्ताहाल है लेकिन दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर अब दिल्ली की सड़कों से गायब हैं। न वो यमुना के पानी की बात करते हैं, न पर्यावरण की, न स्वास्थ्य की और न ही परिवहन की। आखिर, ऐसा क्या हुआ कि लेफ्टिनेंट गर्वनर की सक्रियता ठंडे बस्ते में चली गई। ऐसा होने से और कुछ हुआ या न हुआ हो लेकिन इतना जरूर पुख्ता हुआ कि उनकी सक्रियता के पीछे राजनीतिक हथकंडा था, केजरीवाल सरकार को परेशान करना।
दूसरी तरह अरविंद केजरीवाल भी, अपनी राजनीतिक नाकामयाबियों का ठीकरा केंद्र सरकार पर थोप कर चुप बैठ जाते थे।
इस राजनीतिक रस्साकशी के नतीजे क्या निकाले जा सकते हैं यही कि, राजनीति के हम्माम में सब नंगे हैं। दिल्ली की फिक्र किसको हैं, यहां की समस्याओं के समाधान की इच्छाशक्ति किसमें है। शायद, किसी में नहीं।
दिल्ली की हालिया तस्वीर को ही लीजिए, दिवाली के बाद, छठ पर्व के लिए यमुना पर एक विशेष तालाब बनाया गया। दिलचस्प बात यह रही कि वहां प्रधानमंत्री पूजा के लिए आने वाले थे। लेकिन, आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने उस घाट की पोल खोल दी। दरअसल, उस विशेष घाट में यमुना का जल ही नहीं था। बात इस हद तक प्रचारित हुई कि प्रधानमंत्री ने वहां का अपना कार्यक्रम ही रद्द् कर दिया।
इसी तरह से, दिल्ली के प्रदूषण मापक मीटरों के आसपास पानी के छिड़काव की जानकारी भी सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिय़ा पर दी। रेखा गुप्ता सरकार की बड़ी फजीहत हुई। हां, एक बात जरूर रही कि, ये सारी खबरें और इस बहाने की गई राजनीति, मुख्यधारा मीडिया के विमर्श से गायब रहीं।
ऐसा नहीं है कि, दिल्ली में पहले ऐसी समस्याएं नहीं थी लेकिन तब इन्हें ओवर हाइप किया जाता था। बहस के विषयों में जो विषय नहीं भी होते थे उन्हें बनाया जाता था।
यह सही है कि, राजनीति का अपना चरित्र होता है जिसका लक्ष्य है सत्ता। सत्ता का भी अपना चरित्र है वह किसी की सगी नहीं। जब जिसके हाथ में तलवार रही उसने अपने हित को साधने में देरी नहीं की। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी और क्या आम आदमी पार्टी की सरकार। इस हम्माम में सब नंगे हैं।
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इंट्रो- 1
अरविंद केजरीवाल सरकार की एक बड़ी त्रासदी रही केंद्र में बीजेपी की सरकार। बीजेपी दिल्ली सरकार की गद्दी पर बैठने के लिए काफी समय से आतुर थी। नतीजा हमेशा, केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव के रूप में सामने आया। केजरीवाल आरोप लगाते रहे कि उन्हें काम नहीं दिया जा रहा। दिल्ली सरकार से पास की गई फाइलें लेफ्टिनेंट गर्वनर के पास जाने लगीं और वे केद्र सरकार के इशारे पर ही पास होती थी। मामला इस कदर बिगड़ा कि सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनी हुई सरकार को ताकत देनी चाही तो केंद्र सरकार ने नया कानून ही बना दिया। चुनी हुई सरकार के हाथ से ताकत निकल कर लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथ में चली गई।
इंट्रो – 2
सरकार बदली, दिल्ली में बीजेपी की सरकार बन गई। विनय कुमार सक्सेना अब भी दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं। दिल्ली का हाल और खस्ताहाल है लेकिन दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर अब दिल्ली की सड़कों से गायब हैं। न वो यमुना के पानी की बात करते हैं, न पर्यावरण की, न स्वास्थ्य की और न ही परिवहन की। आखिर, ऐसा क्या हुआ कि लेफ्टिनेंट गर्वनर की सक्रियता ठंडे बस्ते में चली गई।
इंट्रो – 3
यह सही है कि, राजनीति का अपना चरित्र होता है जिसका लक्ष्य है सत्ता। सत्ता का भी अपना चरित्र है वह किसी की सगी नहीं। जब जिसके हाथ में तलवार रही उसने अपने हित को साधने में देरी नहीं की। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी और क्या आम आदमी पार्टी की सरकार।
इंट्रो – 4
यह सही है कि, राजनीति का अपना चरित्र होता है जिसका लक्ष्य है सत्ता। सत्ता का भी अपना चरित्र है वह किसी की सगी नहीं। जब जिसके हाथ में तलवार रही उसने अपने हित को साधने में देरी नहीं की। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी और क्या आम आदमी पार्टी की सरकार। इस हम्माम में सब नंगे हैं।




