संपादकीय

कंज्यूमर इज़ NOT किंग

उपभोक्ता किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में उपभोक्ता न केवल वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करता है, बल्कि बाजार की दिशा...

 

किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में उपभोक्ता न केवल वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करता है, बल्कि बाजार की दिशा और गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। स्वतंत्रता के बाद भारत में उपभोक्ता संरक्षण को लेकर जागरूकता धीरे-धीरे बढ़ी और समय के साथ मजबूत कानूनी ढांचा विकसित हुआ। इसके बावजूद आज भी उपभोक्ता शोषण, भ्रामक विज्ञापन, घटिया उत्पाद, ऑनलाइन धोखाधड़ी और सेवा में कमी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।

भारत में प्रत्येक वर्ष 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है। इस साल भी उपभोक्ता मामले विभाग ने इसे मनाया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ाना, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019, राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (NCH), ई-कॉमर्स नियम, भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण तथा त्वरित शिकायत निवारण जैसी व्यवस्थाओं के बारे  में जानकारी देना था। कार्यक्रम की थीम जागरूक उपभोक्ता, सशक्त भारत’ थी।

जैसा कि आमतौर पर होता रहा है ऐसे कार्यक्रमों में कुछेक संगठन, कुछ उपभोक्ता मामलों से जुड़े कथित विशेषज्ञ और सरकारी तामझाम के साथ मंत्री, सचिव या विशेष आमंत्रितों का भाषण, चाय- खाना। बस, कहानी खत्म। हर साल उपभोक्ता के नाम पर होने वाले ऐेसे कार्यक्रमों से अगर कोई गायब होता है तो वह आम उपभोक्ता होता है जिसके नाम पर सारा तामझाम होता है।

इस साल भी ऐसा ही कुछ हुआ। कार्यक्रम के बारे में सूचनाएं सीमित रखी गईं। किस आधार पर उपभोक्त संगठनों और निकायों को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया इसके बारे में ठोस दिशानिर्देशों का अभाव रहा। उपभोक्ता मामलों के क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीय स्तर के कई गैर सरकारी संगठनों को भी कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता तक नहीं दिया गया। ऐसा क्यों और किसके निर्देश पर किया गया? यह प्रशन अनुत्तरित है।

हालांकि कार्यक्रम में ऐसे सत्रों का आयोजन रखा गया जो कई मायनों में व्यावहारिक थे लेकिन उसका संबंध पेशेवर प्रशिक्षण से ज्यादा था जिसमें लगातार फीडबैक और निगरानी की जरूरत  रहती है। कार्यक्रम ने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सकारात्मक भूमिका निभाई। विशेष रूप से युवाओं और डिजिटल उपभोक्ताओं में ई-कॉमर्स नियमों और शिकायत निवारण तंत्र के प्रति रुचि बढ़ी। हालांकि, वास्तविक प्रभाव तभी दीर्घकालिक होगा जब कार्यक्रम से प्राप्त जानकारी का जमीनी स्तर पर निरंतर प्रसार किया जाए।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में कई ऐसे नवीन विषय क्षेत्र हैं विशेषकर ऑनलाइन कारोबार और उससे जुड़ा बाजारी छल, विवाद निवारण के लिए मध्यस्थता जैसे उपायों पर फोकस और कंज्यूमर हेल्पलाइन की उपादेयता पर विशेष चर्चा जरूरी है। लेकिन ये विषय क्षेत्र ऐसे भी नहीं हैं कि महज आयोजनों और समारोहों में चर्चा का विषय बन कर सीमित रह जाएं।

आयोजन की अपनी सीमाएं तो थी हीं साथ ही उसकी अपनी खामियां भी थीं। सबसे पहली तो यही कि, कार्यक्रम में ग्रामीण एवं कमजोर वर्गों की भागीदारी बहुत सीमित थी।  कार्यक्रम का प्रभाव मुख्यतः शहरी और शिक्षित वर्ग तक सीमित रहा। दूसरा, व्यावहारिक प्रशिक्षण का अभाव था।  उपभोक्ता शिकायत दर्ज करने की लाइव डेमो/वर्कशॉप अपेक्षाकृत कम रहीं। फॉलोअप की कमी काफी अखरी। कार्यक्रम के बाद जागरूकता को बनाए रखने के लिए ठोस कार्ययोजना स्पष्ट नहीं दिखी। इसके अलावा, कार्यक्रम में भाषाई विविधता का सीमित उपयोग किया गयाक्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री और सत्रों की संख्या बढ़ाई जा सकती थी, लेकिन ऐसी हुआ नहीं।

बेहतर होता, अगर राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस जैसे मौके पर ग्रामीण-स्तरीय अभियानों को शुरू किया जाता और पंचायतों, स्कूलों और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से विकेंद्रीकृत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता। हैंड होल्डिंग वर्कशॉप के जरिए ई-दाखिल/NCH पर शिकायत दर्ज करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता। स्थायी जागरूकता तंत्र तैयार किया जाता जहां से  सोशल मीडिया, सामुदायिक रेडियो और स्थानीय भाषाओं में नियमित सामग्री उपलब्ध कराई जाती। इसके अलावा, डेटा-आधारित समीक्षा करने की व्यवस्था की जाती जहां  दर्ज शिकायतों, निस्तारण दर और मध्यस्थता के परिणामों का सार्वजनिक विश्लेषण किया जाता। और अंत में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य उपभोक्ता संरक्षण परिषदों के सशक्तिकरण का सवाल।  केंद्रीय एवं राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की बैठकों और अनुशंसाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मैकेनिज्म तैयार करने की रणनीति जिसके बिना कंज्यूमर कभी किंग भी बन सकता है सोचा ही नहीं जा सकता।

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