धर्म-अध्यात्म

सनातन परंपरा का उत्सव- मकर संक्रांति

मकर संक्रांति का पर्व भारत वर्ष में बड़े ही हर्ष, उत्साह, यश, सम्मान आत्म सम्मान, संपन्नता और नई ऋतु वाला पर्व है। हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में...

नई दिल्ली, कंज्यूमर खबर। मकर संक्रांति का पर्व भारत वर्ष में बड़े ही हर्ष, उत्साह, यश, सम्मान आत्म सम्मान, संपन्नता और नई ऋतु वाला पर्व है। हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नाम से यह पर्व मनाया जाता है। पंजाब या नॉर्थ इंडिया में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है, लेकिन हर जगह यह अपने धार्मिक गुणों और विरासत को उज्ज्वल बनाता है।
विक्रम संवत हो, जहां तिथियां और मास हैं या अंग्रेजी कैलेंडर हो जहां डेट और मंथ हैं, लेकिन मकर संक्रांति दिन 14-15 जनवरी की फिक्स है, सब कुछ बदलता है, लेकिन यह दिन ही नहीं बदलता है क्योंकि इसमें एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोलॉजी दोनों का ही एक अटूट संबंध है।
सबसे पहले आप समझे कि संक्रांति का मतलब साथ मिल परिवर्तन का समय एक राशि का दूसरी राशि में जाना।
सूर्य ग्रह का मकर राशि में जाना मकर संक्रांति कहलाता है जिसे हम सूर्य देवतुल्य का उत्तरायण होना भी कहते हैं। सूर्य देव 6 महीने उत्तरायण और 6 महीने दक्षिणायन रहते हैं।
आकाश में हमारी धरती अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री पर झुकी हुई है और इसी झुकी हुई धरती के कारण जब धरती अपनी ऑर्बिट में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है तो मौसम चेंज होते हैं और साथ-साथ धरती अपनी धुरी पर भी घूम रही है जिससे दिन रात होते हैं।
विंटर सोल्स्टिस दिसंबर 21-22 को रात सबसे लंबी होती है इसके बाद से ही धीरे-धीरे सूर्य उत्तरायण होने लगता है और मकर संक्रांति वाले दिन से जब सूर्य मकर राशि में आ जाता है उसे दिन से हम उत्तरायण की शुरुआत मानते हैं। उत्तरायण से दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं और राते छोटी होनी शुरू हो जाती है।
ज्योतिष में सूर्य को हम आत्मा अथॉरिटी लाइफ फोर्स और डायरेक्शन मानते हैं। मकर राशि शनि की राशि है, जो डिसिप्लिन रिस्पांसिबिलिटी और एडमिनिस्ट्रेशन को दिखाती है कि जब सूर्य मकर राशि में आता है तो जातक कर्म ओरिएंटेड प्रैक्टिकल और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को समझता है। इसलिए सूर्य को 10वें हाउस में दिग्बल प्राप्त होता है, जो उसे वर्क लीडरशिप और रिजल्ट ओरिएंटेड बनाता है। सूर्य राजा है, अथॉरिटी है और मकर राशि गवर्नेंस को दिखाती है कि अथॉरिटी का जब सिस्टम से मिलन हो जाता है तो मैक्सिमम डायरेक्शनल पावर आ जाती है इसीलिए सूर्य कर्म की राशि में उज्ज्वमलता प्राप्त करता है।
उत्तरायण सूचक हैं धर्म और कर्म की दिशा में वृद्धि ज्ञान लक्ष्य और उन्नति की दिशा माना गया है इस समय किए गए कम तेज फल देते हैं।
सूर्य उत्तरायण और दिग्बली होते ही देवतुल्य पितृ बल और सूर्य कारक मजबूत हो जाता है, पितृ दोष को शांत करता है मान सम्मान को बढ़ाता है सरकारी कार्यों में गति आ जाती है। स्वास्थ्य और मानसिक ऊर्जा में सुधार होता है। रोगों से लड़ने की क्षमता आती है, डिप्रेशन भ्रम आलस की कमी होती हैं और निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है।
हमारे श्रीमद्भागवत गीता के आठवें अध्याय के 24वें श्लोक से 27वें  श्लोक तक इस बारे में विस्तृत रूप से समझाया गया है। महाभारत में महा तेजस्वी भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु भी उत्तरायण के समय फलीभूत हुई थी।
इसी दिन सूर्य भगवान अपनी शत्रुता क्रोध भूलकर अपने पुत्र शनि भगवान से मिलने उनके घर गए थे इसलिए सूर्य यहां दिग्बल को प्राप्त करता है। ऋषि भागीरथ अपने पितरों का उद्धार करने के लिए गंगा को इसी दिन धरती पर अवतरित कर लाए थे। उत्तरायण में सात्विक गुना की वृद्धि और दक्षिणायन में तामसिक गुना की वृद्धि होती है।
उत्तरायण में किया गया छोटा सा प्रयास भी बड़ा फल देता है गंगा स्नान दान जप पूजा संकल्प नए काम मकर संक्रांति को करना शुभ माना गया है।
इस दिन तिल गुड़ का दान करने और खाने से सूर्य मजबूत और पितृ दोष में न्यूनता लाता हैं गंगा स्नान करना महान आध्यात्मिक कार्यों में लिखा गया है।
विज्ञान उत्तरायण को पृथ्वी के टिल्ट होने से समझता है साइंस बताती है कि उत्तरायण कब होता है, लेकिन हमारी सनातन परंपरा इस सूर्य बेस सिस्टम को सूर्य देव के देव तत्व से जोड़ती है और हमारी संस्कृति बताती है कि इस समय को सूर्य देव का विशेष कृपा पात्र बन वैभवशाली बन मोक्ष प्राप्त किया जाएं। इसलिए मकर संक्रांति का पूर्व पूरे उत्साह और जोश से मनाना चाहिए।

 

लेख ज्योतिषाचार्य राजेश खन्ना के निजी विचार पर आधारित है।

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