काम की खबरः मेरा दोस्त होमवर्क क्यों नहीं करता ? रोज डांट खाता है फिर भी मानता नहीं…
मेरा एक दोस्त है। नाम नहीं बताऊंगा। मैडम उसे रोज डांटती हैं। कभी भी होमवर्क करके नहीं लाता। उसके मम्मी-पापा को भी स्कूल में बुलाया जाता है और उनसे शिकायत की जाती है।...

बच्चों को प्यार से समझाना जरूरी, अनुशासन के साथ समझ और सहयोग जरूरी
नई दिल्ली, कंज्यूमर खबर। मेरा एक दोस्त है। नाम नहीं बताऊंगा। मैडम उसे रोज डांटती हैं। कभी भी होमवर्क करके नहीं लाता। उसके मम्मी-पापा को भी स्कूल में बुलाया जाता है और उनसे शिकायत की जाती है। एक बार तो उसके पापा ने हम सबके सामने ही क्लास में उसका कान पकड़ लिया। लेकिन उनके जाने के बाद मैंने देखा कि वो हंस रहा था।
होमवर्क तो कई बच्चे नहीं करते लेकिन स्कूल में आकर कई बच्चे तो हम लोगों से कॉपी लेकर कर लेते हैं। मैं अपना होमवर्क तो कर लेता हूं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि होमवर्क मैंने न किया हो। घर में पापा-मम्मी भी क़ॉपी चेक करते हैं। मैडम ने क्या लिखा, क्या काम दिया सब देखते हैं। एक दिन होमवर्क न करो तो डांट पड़ जाती है। वैसे मैं उनको डांटने का मौका ही नहीं देता। क्योंकि बिना होमवर्क खतम किए मुझे कंप्यूटर पर गेम खेलने का मौका ही नहीं मिलता। कितना अच्छा हो अगर हर बच्चा अपना होमवर्क समय से कर ले और फिर हम सब साथ मिलकर खेलें।
बच्चों का होमवर्क और टालमटोल
आज के समय में अधिकांश माता-पिता और शिक्षक एक ही समस्या से जूझ रहे हैं। बच्चे होमवर्क करने में टालमटोल करते हैं। बार-बार कहना, डांटना, डराना या तुलना करना भी अक्सर काम नहीं आता। प्रश्न यह नहीं है कि बच्चा होमवर्क क्यों नहीं कर रहा, बल्कि यह है कि बच्चा होमवर्क के लिए खुद से क्यों प्रेरित नहीं हो पा रहा।
वास्तव में, होमवर्क बच्चों की बौद्धिक क्षमता, आत्मअनुशासन और जिम्मेदारी विकसित करने का साधन है, लेकिन यदि यह बोझ बन जाए तो इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है। इसलिए ज़रूरत है बाहरी दबाव (External Pressure) से निकलकर आंतरिक प्रेरणा (Internal Motivation) विकसित करने की।
पहले कारण समझें : बच्चा होमवर्क से क्यों बचता है?
बच्चे आलसी नहीं होते, बल्कि उनके पीछे कुछ ठोस कारण होते हैं…
1. विषय समझ में न आना
जब बच्चा पाठ नहीं समझ पाता, तो वह उससे बचने लगता है। डर, असफलता और शर्म की भावना उसे होमवर्क से दूर कर देती है।
2. ढेर सारा और उबाऊ होमवर्क
यदि होमवर्क बहुत ज्यादा और बोरिंग है, तो बच्चा उसे बोझ मानने लगता है।
2. तुलना और दबाव
‘देखो तुम्हारा दोस्त, कितना तेज है। फटाफट अपना होमवर्क निपटा लेता है’….. जैसी बातें बच्चे का मनोबल तोड़ देती हैं।
3. ध्यान भटकाने वाले साधन
मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम-ये तुरंत आनंद देते हैं, जबकि होमवर्क में मेहनत लगती है।
4. डर और दंड नहीं, सकारात्मक माहौल बनाइए
अधिकांश घरों में होमवर्क को लेकर माहौल तनावपूर्ण होता है। यह सबसे बड़ी गलती है।
क्या न करें ?
- डांटना या मारना
- होमवर्क को सजा बनाना
- बार-बार ताने देना
क्या करें ?
- शांत और सहयोगी वातावरण बनाएं
- बच्चे को यह भरोसा दिलाएं कि गलती करना सीखने का हिस्सा है
कहें:
- ‘अगर समझ नहीं आया तो हम साथ बैठकर सीखेंगे।’
- जब बच्चा सुरक्षित महसूस करता है, तभी वह प्रयास करता है।
बच्चे को लक्ष्य तय करने में शामिल करें
जब लक्ष्य ऊपर से थोपे जाते हैं, तो प्रेरणा नहीं आती।
सही तरीका
बच्चे से पूछें :
- ‘आज कौन-सा काम पहले करेंगे?’
- ‘तुम कितने समय में यह पूरा कर सकते हो?’
उदाहरण
यदि बच्चा कहे-
‘मैं 30 मिनट में गणित कर लूंगा’
तो यह उसका खुद का लक्ष्य होगा। लक्ष्य पूरा होने पर उसे संतोष और आत्मविश्वास मिलेगा।
समय नहीं, आदत बनाइए
होमवर्क के लिए रोज़ एक निश्चित समय तय करना बहुत जरूरी है।
कैसे?
- रोज़ एक ही समय पर पढ़ाई
- वही जगह (Study Corner)
- पढ़ाई से पहले मोबाइल/टीवी बंद
धीरे-धीरे यह एक स्वाभाविक आदत बन जाती है, जैसे दाँत साफ करना।
छोटे-छोटे हिस्सों में काम बाँटें
पूरा होमवर्क एक साथ देखकर बच्चा घबरा सकता है।
तरीका
- होमवर्क को छोटे भागों में बांटें
- हर भाग के बाद 5 मिनट का ब्रेक
‘पहले ये पांच सवाल, फिर थोड़ा आराम।’
इससे बच्चा थकता नहीं और काम पूरा होता जाता है।
प्रयास की सराहना करें, परिणाम की नहीं
अधिकांश माता-पिता केवल अंक देखते हैं, मेहनत नहीं।
क्या कहें ?
- ‘तुमने पूरी कोशिश की, यह अच्छी बात है।’
- ‘आज तुमने खुद से शुरुआत की, मुझे बहुत अच्छा लगा।’
क्या न कहें ?
- ‘इतने ही नंबर?’
- ‘इतनी देर में बस इतना?’
जब प्रयास की कद्र होती है, तो बच्चा बार-बार कोशिश करता है।
तुलना नहीं, प्रोत्साहित कीजिए
हर बच्चा अलग होता है—उसकी गति, रुचि और क्षमता भी अलग होती है।
तुलना का नुकसान
- आत्मविश्वास कम होता है
- ईर्ष्या और डर पैदा होता है
- सीखने की खुशी खत्म हो जाती है
सही दृष्टिकोण
- बच्चे की तुलना उसके अपने पिछले प्रदर्शन से करें
- ‘पिछली बार से इस बार बेहतर किया है।’
होमवर्क को जीवन से जोड़ें
जब बच्चा समझता है कि पढ़ाई का जीवन से संबंध है, तो रुचि बढ़ती है।
उदाहरण
- गणित → बाजार में हिसाब
- भाषा → कहानी लिखना, संवाद
- विज्ञान → घर के प्रयोग
होमवर्क सिर्फ कॉपी नहीं, जीवन कौशल बने- यह समझ जरूरी है।
तकनीक को दुश्मन नहीं, साथी बनाएं
मोबाइल और ऐप्स पूरी तरह बुरे नहीं हैं।
सही उपयोग
- शैक्षणिक ऐप्स
- वीडियो से समझाना
- ऑनलाइन क्विज़
लेकिन सीमित समय और निगरानी जरूरी है।
माता-पिता स्वयं उदाहरण बनें
बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।
यदि माता-पिता-
- किताब पढ़ते हैं
- कुछ नया सीखते हैं
- समय का सम्मान करते हैं
तो बच्चा भी वैसा ही करने की कोशिश करता है।
शिक्षक-अभिभावक संवाद जरूरी
यदि बच्चा लगातार होमवर्क से बच रहा है, तो शिक्षक से बात करें।
- क्या बच्चा कक्षा में समझ पा रहा है?
- क्या होमवर्क उसकी क्षमता के अनुसार है?
सहयोग से समाधान निकलता है, आरोप से नहीं।
धैर्य रखें, बदलाव के लिए वक्त चाहिए
आत्म-प्रेरणा एक दिन में नहीं आती।
- शुरुआत में बच्चा टाल सकता है
- कभी-कभी पीछे भी जा सकता है
लेकिन यदि आप सहयोग, सम्मान और समझ बनाए रखते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चा खुद कहेगा-
‘आज मुझे होमवर्क करना है।’
बच्चों को होमवर्क के लिए प्रेरित करने का अर्थ उन्हें नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार बनाना है। डर, दबाव और तुलना से नहीं, बल्कि प्यार, विश्वास और मार्गदर्शन से आत्म-प्रेरणा विकसित होती है।
जब बच्चा यह समझने लगे कि-
- होमवर्क उसकी सजा नहीं
- बल्कि उसकी क्षमता बढ़ाने का साधन है
तब वह बिना कहे, बिना रोए, खुद आगे बढ़कर पढ़ाई करेगा। यही सच्ची शिक्षा है।
गांव के बच्चों का होमवर्क : एक अलग चुनौती
भारत जैसे विविधताओं वाले देश में ‘बच्चे’ एक समान वर्ग नहीं हैं। ग्रामीण और शहरी बच्चों की परिस्थितियाँ, संसाधन, पारिवारिक माहौल और चुनौतियाँ अलग-अलग हैं। इसलिए जब हम बच्चों को होमवर्क के लिए स्वयं प्रेरित करने की बात करते हैं, तो एक ही समाधान दोनों पर लागू नहीं किया जा सकता।
यह आवश्यक है कि हम ग्रामीण और शहरी संदर्भों को समझते हुए अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाएँ, ताकि बच्चा दबाव में नहीं, बल्कि समझ और रुचि के साथ पढ़ाई की ओर बढ़े।
ग्रामीण बच्चे
- सीमित शैक्षणिक संसाधन
- कई बार बिजली, इंटरनेट और शांत वातावरण का अभाव
- माता-पिता का कम औपचारिक शिक्षित होना
- घर के काम, खेती, पशुपालन में सहयोग
- शिक्षक-छात्र अनुपात अधिक
गांव के बच्चों में आत्म-प्रेरणा की कमी की समस्या मौजूद है, बस कारण अलग-अलग हैं।
ग्रामीण क्षेत्र में बच्चा अक्सर यह प्रश्न करता है-
‘पढ़कर क्या होगा?’
क्योंकि उसके आसपास तत्काल उदाहरण कम होते हैं।
प्रमुख समस्याएं
- पढ़ाई को जीवन से जोड़कर न देख पाना
- शिक्षक द्वारा समझाकर न पढ़ा पाना
- घर में पढ़ाई का माहौल न होना
- होमवर्क को ‘अतिरिक्त बोझ’ समझना
ग्रामीण बच्चों में आत्म-प्रेरणा कैसे विकसित करें?
पढ़ाई को जीवन से जोड़ना
ग्रामीण बच्चों के लिए किताबों को उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ना बेहद प्रभावी होता है।
उदाहरण
- गणित → खेत की माप, बीज की गिनती
- विज्ञान → फसल, मौसम, पानी
- भाषा → लोककथाएं, अनुभव लेखन
जब बच्चा देखता है कि पढ़ाई उसकी ज़िंदगी से जुड़ी है, तो वह खुद सीखने के लिए आगे आता है।
सामूहिक अध्ययन (Group Study)
ग्रामीण क्षेत्रों में सामूहिक पढ़ाई बहुत कारगर है।
- बच्चे साथ बैठकर होमवर्क करें
- बड़ा बच्चा छोटे को सिखाए
- शिक्षक या स्वयंसेवक सप्ताह में एक बार सहयोग करें
इससे बच्चा अकेला नहीं महसूस करता और पढ़ाई में रुचि बढ़ती है।
माता-पिता की भूमिका: पढ़े-लिखे होना ज़रूरी नहीं
ग्रामीण माता-पिता अक्सर कहते हैं-
‘हमें पढ़ना नहीं आता, हम क्या मदद करें?’
लेकिन-
- बच्चे से उसका होमवर्क दिखाने को कहना
- समय पर बैठने के लिए कहना
- प्रयास की तारीफ करना
यही आत्म-प्रेरणा की नींव है।
ग्रामीण और शहरी—दोनों बच्चों के लिए समान सूत्र
- डर नहीं, संवाद
- तुलना नहीं, सहयोग
- परिणाम नहीं, प्रयास की सराहना
- आदेश नहीं, सहभागिता
आत्म-प्रेरणा का मूल मंत्र यही है।
शिक्षक की भूमिका: सेतु की तरह
ग्रामीण हो या शहरी
शिक्षक की भूमिका निर्णायक है।
- होमवर्क उद्देश्यपूर्ण हो
- बच्चे की क्षमता के अनुसार हो
- समझाकर दिया गया हो
- फीडबैक जरूर मिले
जब बच्चा देखता है कि शिक्षक उसके प्रयास को पहचानता है, तो वह खुद मेहनत करता है।
नीति और समाज की भूमिका
ग्रामीण क्षेत्र में
- अध्ययन केंद्र
- स्वयंसेवी शिक्षक
- डिजिटल संसाधनों की पहुँच
शहरी क्षेत्र में
- होमवर्क का मानकीकरण
- मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान
- अभिभावक-शिक्षक कार्यशालाएँ
निष्कर्ष
ग्रामीण और शहरी बच्चों की दुनिया अलग है, लेकिन *उनकी भावनाएं, डर और संभावनाएं समान हैं*। आत्म-प्रेरणा न डांट से आती है, न डर से—वह आती है सम्मान, समझ और विश्वास से।
यदि हम बच्चे को यह महसूस करा सकें कि—
- वह सक्षम है
- उसकी मेहनत मायने रखती है
- पढ़ाई उसका अपना सफर है
तो चाहे बच्चा गांव का हो या शहर का, वह खुद कहेगा “मुझे आज अपना होमवर्क करना है।” यही शिक्षा की सच्ची जीत है।




