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राजधानी की सड़कों से गायब डीटीसी, नई बसें आई नहीं पुरानी हटा दीं

दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था चरमरा रही है क्योंकि दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) और क्लस्टर बसों की संख्या में भारी कमी आई है। पुरानी बसों को हटाने के बाद नई बसें नहीं आ रही हैं जिससे यात्रियों की परेशानी सड़कों पर देखी जा सकती है। फरवरी में दिल्ली में बीजेपी सरकार आने के बाद से अब तक 1200 से अधिक पुरानी बसें हटाई जा चुकी हैं। हटाई जा रही पुरानी बसों की तुलना में नई बसें नहीं आ रही हैं, जिससे आम आदमी की परेशानी बढ़ती जा रही है...

नई दिल्ली, कंज्यूमर खबर। दिल्ली में एक साल पहले तक 7300 से अधिक बसें थीं। अब यह संख्या घटकर 5300 के आसपास रह गई है। यानी एक साल में 2000 से अधिक बसें हटाई जा चुकी हैं। जुलाई में सबसे ज़्यादा बसें हटाई गईं। बसों की कमी के कारण ज्यादातर लोग मेट्रो, आटो और निजी टैक्सी सुविधा ऊबर- ओला आदि से महंगा किराया खर्च कर अपने गंतव्य तक पहुंचने को मजबूर हैं। सरकार का दावा है कि पर्यावरण-प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। लेकिन जब एक अनुमान के मुताबिक़ 40 लाख लोग रोज बसों में सफर करते है तब कम बसों से कैसे काम चलेगा। हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि 60 बसों पर 150  कंडक्टर है, लिहाजा एक बस पर तीन- तीन कंडक्टर ड्यूटी कर रहे है।

जुलाई में डिम्प्टस के तहत चलने वाली 533 क्लस्टर बसों को सड़कों से हटा दिया गया था क्योंकि इन बसों का टेंडर आगे नहीं बढ़ाया जा सका था। ये बसें दो कंपनियों की थीं। डीटीसी की 452 बसें भी उम्र पूरी हो जाने के कारण जुलाई महीने में ही हटा दी गईं। जुलाई में 985 बसें सड़कों से हटाई गईं। इनके हटने के बाद दिल्ली सरकार के पास कुल 5300 बसें बची हैं। इनमें से 2400 बसें डिम्प्टस की और 2900 बसें डीटीसी की बची हैं। दिल्ली में पहले से ही बसों की भारी कमी है। इन बसों के हटने से बस अड्डों पर भीड़ और इंतज़ार दोनों बढ़ गए हैं।

सरकार की उदासीनता

दिल्ली में लगभग 11,000 बसों की ज़रूरत तुरंत बताई जा रही है। केंद्र और दिल्ली में एक ही पार्टी की सरकार होने के कारण जनता को काम में तेज़ी की उम्मीद थी। लेकिन डीटीसी, परिवहन विभाग और दिल्ली के परिवहन मंत्रालय की गंभीरता बसें उपलब्ध कराने के मामले में नहीं दिख रही है। डीटीसी और परिवहन विभाग की प्लानिंग पर भी सवाल उठ रहे। बाहरी दिल्ली के कई रूट पर बसें आनी ही बंद हो गई हैं। दिल्ली में प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए दिल्ली सरकार ने डीटीसी और क्लस्टर स्कीम, दोनों के लिए इलेक्ट्रिक बसें खरीदना अनिवार्य कर दिया है। ऐसे में अब जितनी भी नई बसें आ रही हैं, वो सब इलेक्ट्रिक हैं। सरकार का यह निर्णय पर्यावरण के लिहाज से तो काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे लागू करने के लिए जिस प्रकार की अग्रिम योजना (एडवांस प्लानिंग) और तैयारी करने की जरूरत थी, उसमें कहीं न कहीं बड़ा गैप नजर आ रहा है।

सरकारी विभागों, बस निर्माता कंपनियों और बस ऑपरेटरों के बीच भी तालमेल का अभाव देखने को मिल रहा है। नई इलेक्ट्रिक बसें लाने और उन्हें ऑपरेट करने से पहले बस डिपो का इलेक्ट्रिफिकेशन बेहद जरूरी है, लेकिन यह काम तेज रफ्तार से नहीं हो पा रहा है, जिसके चलते नई बसों का परिचालन शुरू करने में देरी हो रही है। देश में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक बसें बनाने का काम अभी तीन-चार चुनिंदा कंपनियां ही कर रही हैं। हालांकि, ये कंपनियां पिछले दो साल में 1500 से ज्यादा इलेक्ट्रिक बसें डिलीवर कर चुकी हैं, लेकिन अभी भी 3000 से ज्यादा बसों के ऑर्डर पेंडिंग पड़े हुए हैं। नई बसों की डिलिवरी में हो रही देरी और पुरानी बसों की उम्र पूरी होने या कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने की वजह से भी बसों की कमी की समस्या पैदा हो रही है।

आंकड़ों पर नजर

परिवहन विभाग के आकड़ों के मुताबिक़ जनवरी 2025 से 25 अप्रैल तक कम से कम एक दो हजार बसें हटाई गई। जनवरी में 57, फरवरी में 337, मार्च में 345, अप्रैल में 11, मई में 232, जून में 96, जुलाई में 985, इसी प्रकार  सितंबर से मार्च 2026 के बीच भी बसें हटाई जानी है। सितंबर में 462, अक्टूबर में 84, दिसंबर में 99, जनवरी में 57, में फरवरी 20 और मार्च में कुछ बसों की मियाद पूरी होने के बाद लगभग एक हजार बसे फिर सड़क से गायब हो जाएगी। यह भी कहा जा रहा है कि बसों को लेकर जो ताजा दावा है उसमें छोटी बड़ी सभी मिलाकर 7300 बसें अभी दिल्ली में उपलब्ध हैं जबकि जरूरत 10-12 हजार बसों की है। 2200 के करीब बसें एक-दो महीने में सड़कों से हटने वाली हैं।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ 40,00,000 लोग हर दिन डीटीसी बसों में सफर करते हैं। 4195 बसें हैं डीटीसी के बेड़े में, इनमें 1300 नई इलेक्ट्रिक बसों के अलावा सीएनजी से चलने वाली 2,895 पुरानी बसें भी 414 रूटों पर चलती हैं। डीटीसी की बसों में 8 रूट एनसीआर के भी हैं। करीब चार हजार बसें चल रही हैं क्लस्टर स्कीम में, इनमें 350 नई एयर कंडीशंड इलेक्ट्रिक बसों के अलावा 100 छोटी इलेक्ट्रिक फीडर बसें भी शामिल हैं। इस हालात में जनता के पास सिवाय सरकार को कोसने के क्या उपाय है ?

बताया जा रहा है कि हटाई गई बसें अभी तकनीकी रूप से सड़क पर चलने के योग्य थी और दो साल तक इनकी संचालन अवधि बढ़ाई जा सकती थी। लेकिन परिवहन विभाग ने इन्हें फिर से संचालन की अनुमति नहीं दी। डिपो में इलेक्ट्रिक बसों के लिए जगह बनाने की योजना को भी इस फैसले की एक वजह माना जा रहा है। बताया जाता है कि डिम्प्टस की इन बसों का संचालन पिछले 10 सालों से हो रहा था। जून 2024 में दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने इनके संचालन पर रोक लगा दी थी, लेकिन बस ऑपरेटर कोर्ट गए और उन्हें 15 जुलाई 2025 तक का अस्थायी विस्तार मिल गया।  अब वह अवधि समाप्त होने पर ये बसें हटा दी गई। बीजेपी सरकार ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। जिसका खामियाजा दिल्ली की जनता को उठाना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों की राय
परिवहन योजना विभाग, योजना एवं वास्तुकला विद्यालय के प्रोफेसर सेवाराम मानते है कि
दिल्ली में सिर्फ़ दो तरह की बसें ही कामयाब हो सकती हैं। ये हैं बड़ी बसें जो लंबी दूरी तक चलती हैं और छोटी बसें जो संकरी सड़कों पर चल सकती हैं। इनमें से देवी बस जैसी बसों के कामयाब होने की प्रबल संभावना है।

ट्रांसपोर्ट विभाग, दिल्ली सरकार के पूर्व उपायुक्त अनिल छिकारा का मानना है कि दिल्ली के लिए बसों की कमी कोई नई बात नहीं है, लेकिन अभी जो स्थिति चल रही है, उसे बेहतर योजना करके रोका जा सकता था। डीटीसी बसों की तर्ज पर क्लस्टर बसों की मियाद भी 10 साल और 7 लाख किमी तय की गई थी, लेकिन जिस तरह डीटीसी में नई बसें आने में देरी होने पर अच्छी कंडीशन वाली पुरानी बसों को एक्सटेंशन दे देकर 5 साल और चलाया गया, उसी तरह क्लस्टर बसों के मामले में भी समय पर एक्सटेंशन देने का निर्णय लेकर लोगों को परेशानी से बचाया जा सकता था।

परिवहन विभाग के मंत्री डा पंकज सिंह कहते है कि साल के अंत तक लगभग 6,000 इलेक्ट्रिक बसें आ जाएगी। पहले परिवहन विभाग दिल्ली में लगभग 400 इलेक्ट्रिक बसें थीं। आज इलेक्ट्रिक बसों की संख्या 3,400 से ज़्यादा है और इस साल के अंत तक दिल्ली की सड़कों पर लगभग 6,000 इलेक्ट्रिक बसें दौड़ती नज़र आएंगी। हमारी सरकार का मिशन बिल्कुल स्पष्ट है, हम चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को और मज़बूत करेंगे। इसके साथ ही, हम इलेक्ट्रिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का विस्तार करेंगे और राजधानी दिल्ली को इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने वाला एक आदर्श शहर बनाएंगे।

हर्ष कुमार

20 साल से नोएडा से दिल्ली और दिल्ली से नोएडा यात्रा करने वाले हर्ष कुमार का कहना है कि इस समय दिल्ली में शीला दीक्षित के समय से पहले का हाल देखा जाने लगा है। उस समय तो कम से कम ब्लू लाइन बसें थी, जो निजी तौर पर चलाई जा रही थी। उस कठिनाइयों के बावजूद लोगों को कम से कम दिल्ली नोएडा आने जाने में सुविधा तो होती थी। शीला दीक्षित ने ब्लू लाइन बसों को हटाया तो एक तरह से यह कहा गया कि दिल्ली में अब खूनी बसें सड़क पर नहीं चलेगी। उसके बदले में उन्होंने लाल रंग की एसी बसें और हरी रंग की दिल्ली परिवहन निगम की बसें सड़कों पर लाई। इसका परिणाम कुछ दिनों में सकारात्मक रूप से दिखा और दिल्ली से नोएडा की कम से कम 10 बसे डीटीसी की चलने लगी लेकिन अरविंद केजरीवाल के समय नोएडा की बस से कम होती गई और इस समय दिल्ली की रेखा गुप्ता के समय नोएडा की बसें न बराबर है।

राजेश

मयूर विहार फेस 3 से कनॉट प्लेस आने वाले राजेश कहते हैं कि पता नहीं क्या हुआ, अकस्मात बस कम कर दी गई। पिछले 2 महीने में तो लगता है दिल्ली सरकार ने इस रूट से बस हटाने की कसम खा ली है।  378 नंबर की बसें तो हर 2 मिनट पर मिलती थी अब सड़क से गायब है। इसी तरह 359 नंबर की बसें जो कनॉट प्लेस, शिवाजी स्टेडियम से मयूर विहार फेस 3 त्रिलोकपुरी कल्याणपुरी और धर्मशिला होकर जाती थी, अचानक बंद कर दी गई। –वहीं दूसरी यात्री मानसी कहती हैं कि सड़कों से पुरानी बसें हटाने के बाद से हालत बहुत खराब है, क्योंकि घंटों इंतजार करने के बाद बस आती हैं, और जो बस आती है उसमें इतनी भीड़ रहती है, कि उसमें महिलाए चढ़ नहीं सकती है। रोजाना दफ्तर जाने वाले लोगों के बच्चों के लिए इंतजार कराना उचित नहीं है, जिस वजह से वह दूसरा साधन लेकर घर चली जाती हैं। वहीं रेखानाम की महिला भी बताती हैं, कि वह भी आधे घंटे से बस का इंततार करती है लेकिन बस बहुत कम आने के बाद काफी परेशानी उठानी पर रही है।

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