दिल्ली के ‘ग्रीन लंग्स’ पर खतरा, क्यों मचा बवाल ?
अरावली पर्वत मालाओं को लेकर नई परिभाषा से विवाद उठ खड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश को स्वीकार करते हुए आदेश दिया है कि केवल वे ही भू-आकार/हिल्स स्थानीय आधार पर 100 मीटर या अधिक ऊंचाई है, उन्हें ही 'अरावली हिल्स' के रूप में माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले और सरकार की मंशा पर सवाल
भारी विरोध के बीच नए संरक्षण कानून की मांग
नई दिल्ली, कंज्यूमर खबर। अरावली पर्वत मालाओं को लेकर देश में इन दिनों बवाल मचा हुआ है। अरावली के उत्तरी विस्तार दिल्ली रिज को खासतौर पर दिल्ली का ग्रीन लंग्स कहा जाता है। यही पहाड़ियां दिल्ली को थार की गरम हवाओं से बचाती हैं। लेकिन, अरावली पर्वत मालाओं को लेकर नई परिभाषा से विवाद उठ खड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश को स्वीकार करते हुए आदेश दिया है कि केवल वे ही भू-आकार/हिल्स स्थानीय आधार पर 100 मीटर या अधिक ऊंचाई है, उन्हें ही ‘अरावली हिल्स’ के रूप में माना जाएगा।
इस परिभाषा के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक विस्तृत 692 कि.मी. लंबी पर्वत शृंखला की 100 मीटर से नीचे की छोटी पहाड़ियां और ढलानें अब ‘अरावली’ नहीं मानी जाएंगी। विशेषज्ञों के अनुसार, इस नई ऊंचाई-आधारित परिभाषा से लगभग 90 प्रतिशत अरावली क्षेत्र ‘अरावली’ के दायरे से बाहर हो सकता है।
इसका अर्थ यह है कि अरावली को पिछले तीन दशकों में मिला कानूनी संरक्षण अब खत्म हो गया है और इसके ज्यादातर क्षेत्र खनन कारोबारियों के लिए खोल दिए जाएंगे। यानी सत्ता चाहे तो इस 100 मीटर से निचले इलाकों को अपने वित्त पोषकों के हवाले कर उससे ऊंची चोटियों को धराशाही करने की छूट दे सकती है। इससे वे हिस्से अब पुराने प्रोटेक्शन नियमों से मुक्त हो सकते हैं और उन पर खनन, निर्माण और अन्य विकास गतिविधियों का दबाव बढ़ सकता है।
अरावली पर्वत शृंखला थार मरुस्थल और पूर्वी मैदानों के बीच एक प्राकृतिक अवरोधक का काम करती है जो पश्चिम से आने वाली गर्म और शुष्क हवाओं (लू और धूल भरी आंधियां) को काफी हद तक रोकती या धीमा करती है, जिससे राजस्थान के पूर्वी भाग, हरियाणा और दिल्ली में इन हवाओं का असर कम होता है।
यह देश के उत्तर-पश्चिम में रेगिस्तान के फैलाव को रोकने, भू-जल रिचार्ज और हवा को साफ रखने का काम करती है। इस विस्तृत भू-भाग में जलवायु को संतुलित रखने में अरावली पर्वतमाला की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इससे दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पूर्वी राजस्थान में धूल की आंधियां कम आती हैं, तापमान कुछ हद तक नियंत्रित रहता है। जिससे गर्मियों में यह 2-3 डिग्री सेल्सियस तक कम प्रभावी हो जाता है और मरुस्थलीकरण की गति धीमी पड़ती है।
अरावली के उत्तरी विस्तार दिल्ली रिज को विशेष रूप से दिल्ली का ‘ग्रीन लंग्स’ कहा जाता है, जो शहर को थार की गर्म हवाओं से बचाता है। यदि अरावली में खनन वृद्धि से इसकी हरियाली का क्षरण होता रहा तो यह क्षेत्र अर्ध-मरुस्थलीय हो सकते हैं।
पहले समझिए पूरा मामला : अरावली केस क्या है?
अरावली पर्वतमाला से जुड़ा मामला कई वर्षों से उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, जिसका मूल प्रश्न यह रहा है कि अरावली पहाड़ियाँ आखिर हैं क्या और उन्हें कैसे परिभाषित किया जाए? इस मुद्दे पर अलग-अलग राज्यों में अलग परिभाषाएँ लागू थीं, जिससे खनन, निर्माण और पर्यावरण संरक्षण को एकराय नहीं थी। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया, जिसके अनुसार—
- जिस भू-भाग की ऊँचाई आसपास के सामान्य धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक है, वही अरावली हिल मानी जाएगी।
- यदि ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में हों, तो उन्हें अरावली रेंज कहा जाएगा।
- सरकार का तर्क है कि इससे पूरे देश में एक समान और स्पष्ट परिभाषा लागू होगी।
- हालाँकि, इसी बिंदु पर विवाद शुरू होता है, क्योंकि अरावली केवल ऊँचाई नहीं, बल्कि एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र है।
न्यायालय के इस ताज़ा फैसले का शायद एक कारण यह भी है कि अरावली संरक्षण के लिए कोई ठोस तथा अलग से कानून नहीं है। जबकि 1992 का कानून सीमित था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कुछ सवाल भी उठते हैं। क्या यह आदेश पारित करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र के विषय विशेषज्ञों की राय जानने की कोशिश की? और, वह भी तब जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में लगातार बढ़ते वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई से सांस और फेफड़े की बीमारियां फैल रही हैं, इनके रोगियों की बढ़ती भीड़ सम्हालने में अस्पतालों को कितनी मशक्कत करनी पड़ रही है, यह जगजाहिर है।
क्या होगा नुकसान
दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में धूल, जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन की आशंका बढ़ सकती है। प्रदूषण बढ़ेगा और गर्मी का असर और भी अधिक तीव्र होगा।
हालांकि अरावली अब बहुत ऊंची नहीं रही और कुछ जगहों पर गैप हो गए हैं, इससे यह पश्चिम से आने वाली गर्म आंधियों को पूरी तरह से रोक नहीं देती लेकिन इसका महत्वपूर्ण मॉडरेटिंग प्रभाव अवश्य है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में अरावली की रक्षा के लिए ‘अरावली बचाओ’ अभियान और अफ्रीका में सहारा मरुस्थल के विस्तार को रोकने के लिए शुरू की गई ‘ग्रेट ग्रीन वॉल पहल’ से प्रेरित भारत सरकार की महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय पहल ‘अरावली हरित दीवार परियोजना’ में अरावली पर्वत शृंखला के आसपास 5 कि.मी. चौड़ी और लगभग 1,400 कि.मी. लंबी हरित पट्टी विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अरावली के क्षरण से सबसे ज्यादा नुकसान राजस्थान को होने की आशंका है। उपलब्ध सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान में मौजूद अरावली पहाड़ियों में से लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ 100 मीटर की ऊँचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि, राजस्थान की केवल 8–10% पहाड़ियाँ ही “अरावली” की कानूनी परिभाषा में आएँगी। करीब 90% पहाड़ियाँ संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकती हैं। यह तथ्य इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि, अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में ही स्थित है।
ये छोटी और मध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ ही वर्षा जल को रोकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अरावली को नुकसान होने की स्थिति में कई तरह के संकट पैदा होंगे। जैसे कि अरावली, भूजल पुनर्भरण करती हैं। धूल भरी आँधियों को रोकती है
थार रेगिस्तान के फैलाव में बाधा बनती है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ये पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हुईं, तो अलवर, जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनूं, उदयपुर, राजसमंद जैसे जिलों में भूजल स्तर और गिरेगा सूखे की तीव्रता बढ़ेगी, खनन और अनियंत्रित निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। राजस्थान पहले ही जल-संकटग्रस्त राज्य है। ऐसे में अरावली का कमजोर होना केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संकट को जन्म देगा।
क्या कहती है पर्यावरण अध्ययन रिपोर्ट ?
ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच की 2024-2025 रिपोर्ट्स के अनुसार, 2001-2024 के बीच भारत के वनाच्छादित क्षेत्र में कुल 60 प्रतिशत का नुकसान हुआ है हालांकि इसमें ज्यादा हिस्सा उत्तर-पूर्वी राज्यों में का है जिसमें असम में सबसे अधिक नुकसान दर्ज किया गया।
यह सब देखते हुए अरावली पहाड़ बचाने का अलग कानून अब जरूरी है। आज नदियों और तालाबों को बचाने के प्रयास सरकारी तथा गैर सरकारी दोनों ही स्तरों पर किये जा रहे हैं तो देर-सवेर वे अधिक नहीं तो कम ही सही, बहाल हो सकते हैं, लेकिन ध्वस्त हो गए पहाड़ों को पुनर्स्थापित कदापि नहीं किया जा सकता। खनन से नष्ट पहाड़ कभी पुनर्जीवित नहीं होते। इसीलिए अरावली फिर वैसी नहीं बन सकती। सरकारों द्वारा वनीकरण योजना के तहत विकसित या रोपित वनों तथा प्राकृतिक रूप से निर्मित जंगलों में जो धरती-आसमान जितना अंतर होता है, उसे हमें समझना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि यह मामला सिर्फ अरावली पर्वत शृंखला के संरक्षण का नहीं बल्कि सारे देश की जलवायु नियंत्रित करने वाले प्रकृति प्रदत्त बड़ी प्रणाली को यथावत बचाने की जरूरत का है। जिसके तहस-नहस होने से यह देश भयंकर आपदाओं के दुष्चक्र में फँस जाएगा, यह निश्चित है।




