क्योंकि मैं राजपथ हूं…
आज ये सब मैं क्यों सुना रहा हूं ? दरअसल मैं सुनाना कुछ नहीं चाहता मैं तो बस चुपचाप, निशब्द साक्षी बनता रहा हूं। इतिहास को खुद में संजोए हूं मैं। भारत के लोकतंत्र का सबसे प्रभावशाली और प्रतीकात्मक मंच रहा हूं मैं। मै सिर्फ कोई एक भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि सत्ता और जनता, शासन और संघर्ष, परंपरा और परिवर्तन के बीच निरंतर चलने वाले संवाद का साक्षी रहा हूं।
नई दिल्ली। मैं राजपथ हूं। अब लोग मुझे कर्तव्य पथ के नाम से जानने लगे हैं। लेकिन मन की बात कहूं मेरे पुराने नाम मे जो बात थी न वो इस नए में कहां। राजनीति है। मैंने इस देश की राजनीति को बहुत करीब से देखा है। राजे- महाराजे से लेकर, गोरों और फिर अब अपने लोकतंत्र को। बड़ी-बड़ी सताओं को, हुक्मरानों को ढेर होते देखा है। झंडों को बदलते देखा है। मैने गांधी के शव की भारत के सपनों के साथ बिदाई देखी है। बहुत कुछ देखा है। बहुत कुछ देखना बाकी है।
खैर, आज ये सब मैं क्यों सुना रहा हूं ? दरअसल मैं सुनाना कुछ नहीं चाहता मैं तो बस चुपचाप, निशब्द साक्षी बनता रहा हूं। इतिहास को खुद में संजोए हूं मैं। भारत के लोकतंत्र का सबसे प्रभावशाली और प्रतीकात्मक मंच रहा हूं मैं। मै सिर्फ कोई एक भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि सत्ता और जनता, शासन और संघर्ष, परंपरा और परिवर्तन के बीच निरंतर चलने वाले संवाद का साक्षी रहा हूं। आज मैं तुमको बीते साल की कहानी सुनाता हूं, नया साल तो अभी शुरू हुआ है। इसकी कहानी अगले साल।
बीते साल की बात करूं तो वह सत्ता, संघर्ष, सवाल और संकल्प का जीवंत दस्तावेज रहा। वो साल राजनीतिक रूप से जितना उथल-पुथल भरा रहा, उतना ही वैचारिक और सामाजिक दृष्टि से भी निर्णायक साबित हुआ। मैंने 2025 में उत्सव की भव्यता भी देखी, आक्रोश की तीव्रता भी, लोकतांत्रिक सवालों की गूंज भी और नए भारत के आत्मविश्वास की झलक भी देखी।
सबसे पहले बात शुरू करता हूं गणतंत्र दिवस समारोह 2025 की। इस समारोह में सच कहूं तो विकसित भारत के आत्मविश्वास की कुछ-कुछ झलक देखने को मिली। साल की शुरुआत 26 जनवरी 2025 को गणतंत्र दिवस के साथ हुई। इस दिन यहां आयोजित परेड केवल एक औपचारिक सैन्य प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक संदेश, राष्ट्रीय दृष्टि और वैचारिक प्रस्तुति का मंच जैसा लग रही थी।
परेड में मैंने जो देखा उससे लगा कि उसमें सरकार यह दिखाना चाहती थी उसकी सोच क्या है, वो क्या करना चाहती है। तभी तो उसका फोकस बहुत साफ दिख रहा था।
- विकसित भारत @2047
- आत्मनिर्भर रक्षा प्रणाली
- डिजिटल और तकनीकी भारत
- महिला नेतृत्व और युवा शक्ति
जैसे मसलों को खासतौर पर परेड में प्रदर्शित किया गया।
राज्यों की झांकियों में अब केवल लोकनृत्य या ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि स्टार्ट-अप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन टेक्नोलॉजी, जल संरक्षण और महिला उद्यमिता जैसे विषय प्रमुख रहे। इससे संकेत बहुत साफ था कि भारत अपनी पहचान को अतीत से आगे ले जाकर भविष्य में स्थापित करना चाहता है।
सशस्त्र बलों की परेड में स्वदेशी हथियार प्रणालियों और रक्षा तकनीक ने यह संदेश दिया कि भारत अब केवल उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भर शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
सत्ता के उत्सव के बीच उठते सवाल
मैं ये भी बताता चलूं कि मेरे आसापास तो भव्यता और अनुशासन का दृश्य था, लेकिन उसी समय देश के कई हिस्सों में और कभी-कभी तो मेरे आसापास ही लोकतांत्रिक असंतोष के स्वर भी सुनाई दे रहे थे। 2025 में सरकार की कई नीतियों और फैसलों पर सवाल उठे।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंध
- चुनावी प्रणाली और पारदर्शिता
- बेरोजगारी और आर्थिक असमानता
- किसानों और श्रमिकों के अधिकार
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
जैसे सवालों पर तो खासा बवाल हुआ। राज्यपाल की शक्तियों पर सवाल उठा। दिल्ली की असली ताकत किसके पास यह सवाल भी शीर्ष अदालत पहुंचा। देश की चुनाव प्रणाली को लेकर तो जमकर बवाल हुआ। अभी भी चल ही रहा है। ईवीएम पर लेकर शक है। सरकार कहती है सब ठीक है। चुनाव आयोग भी वही बोलता है। पर मैं कहूं लोकतंत्र में अगर शक है तो गड़बड़ है। शक का निवराण तो होना ही चाहिए।
बेरोजगारी, किसानों की मांगें और अभिव्यक्ति के सवाल तो यहां रोज ही उठते रहे हैं। इस साल भी उठे। राजपथ या मेरे आसपास कई बार विरोध प्रदर्शनों, धरनों और मार्चों की आहट सुनाई दी। हालांकि सुरक्षा कारणों से अधिकांश प्रदर्शन सीमित क्षेत्रों में आयोजित हुए, लेकिन उनका प्रतीकात्मक केंद्र मैं ही था।
न्यायपालिका पर बहस और राजपथ की राजनीतिक गूंज
साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों को लेकर देश भर में खूब बहस हुई। न्यायपालिका की भूमिका, उसकी स्वतंत्रता और उसकी सीमाओं पर राजनीतिक विमर्श ने तीखा रूप लिया।
मैंने सुना कि कई सवाल उठे
- क्या न्यायालय नीति निर्धारण में हस्तक्षेप कर रहा है?
- क्या सरकार न्यायपालिका की स्वायत्तता को सीमित करना चाहती है?
- क्या संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन बिगड़ रहा है?
इन सवालों की गूंज संसद से निकलकर मुझ तक आ पहुंची। टीवी कैमरे, मीडिया वैन और डिजिटल पत्रकारिता ने राजपथ को न्यायिक-राजनीतिक बहस का प्रतीक स्थल बना दिया। मैं कहूं तो यह कतई ठीक नहीं था। न्यायालय की अपनी गरिमा होती है और सरकार की भी अपनी मर्यादा। अच्छा थोड़ी लगता है कि उनके बीच की लड़ाई सड़क पर लड़ी जाए। लेकिन हुआ तो यही।
संसद सत्र और राजपथ का मौन संवाद
2025 में संसद सत्रों के दौरान जब-जब सदन में शोर, बहिष्कार, तीखी बहस और नोंकझोंक हुई, तब-तब मेरे आसपास राजनीतिक हलचल बढ़ गई।
- विपक्षी सांसदों के बयान
- सत्तापक्ष के आक्रामक तेवर
- मीडिया की लाइव कवरेज
सब कुछ यहीं से चलने लगा। कई बार तो लगा कि इनके बीच मार-पीट न हो जाए। सुना है स्टूडियो में तो यह सब चलने ही लगा है। खैर, मुझे क्या, मैं तो खामोश सबकुछ देखता ही रहता हूं। वैसे मै बता दूं कि, राजपथ और संसद भवन के बीच का यह संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का प्रतीक है। संसद में उठे सवालों का जवाब अगर जनता तो राजपथ पर तलाशना पड़ रहा है तो कहीं न कहीं दाल में कुछ काला है।
जनआंदोलन और नागरिक चेतना
2025 में मैंने यानी राजपथ ने यह भी देखा कि आम नागरिक अब केवल दर्शक नहीं रहा।
- छात्र संगठनों ने शिक्षा और रोजगार को लेकर आवाज़ उठाई
- महिला समूहों ने सुरक्षा और समानता की मांग की
- किसान संगठनों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि सुधारों पर प्रश्न खड़े किए
हालांकि सुरक्षा व्यवस्था के कारण कई आंदोलनों की हदबंदी कर दी गई, लेकिन राजपथ का प्रतीकात्मक महत्व बना रहा। यह संदेश स्पष्ट था कि, लोकतंत्र में सड़कें केवल कारों, मोटरसाइकिलों और बसों के लिए नहीं होती बल्कि संवाद और संघर्ष की पटकथा लिखने के लिए भी होती हैं।
सांस्कृतिक भारत की झलक
राजपथ 2025 में केवल राजनीति का ही मंच नहीं रहा।
- राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव
- योग और फिटनेस कार्यक्रम
- सैन्य बैंड और लोककला प्रस्तुतियाँ
- युवा और छात्र उत्सव
जैसे आयोजनों का भी मैं साक्षी रहा। इन आयोजनों ने यह दिखाया कि सरकार राजपथ को जन-सांस्कृतिक स्थान के रूप में स्थापित करना चाहती है। आम नागरिकों की बढ़ती मौजूदगी ने राजपथ को सत्ता से जनता की ओर पलटते हुए देखा।
डिजिटल युग का राजपथ
2025 में मेरा यानी राजपथ का हर दृश्य तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
- ड्रोन से ली गई तस्वीरें
- लाइव स्ट्रीम
- रील्स और डिजिटल रिपोर्टिंग
राजपथ अब केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। वह मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से देश के हर कोने में पहुँचा। यह डिजिटल लोकतंत्र का नया चेहरा था, जहाँ दृश्य, विमर्श और विवाद सब कुछ रियल टाइम में जनता तक पहुँचा।
चुनावी वर्ष की आहट
हालांकि 2025 में राष्ट्रीय चुनाव नहीं थे, लेकिन यह वर्ष राजनीतिक रणनीति और जनमत निर्माण का था।
- राजनीतिक दलों के शक्ति प्रदर्शन
- वैचारिक सम्मेलन
- जनसंपर्क अभियान
मैं यानी राजपथ इन सबका मौन साक्षी बना रहा। यह मार्ग आगाह करता रहा कि आने वाले वर्षों में सत्ता की दिशा क्या होगी और जनता की अपेक्षाएँ क्या हैं।
राजपथ—भारत की आत्मा का प्रतिबिंब
साल 2025 में दिल्ली के राजपथ ने यह साबित किया कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं होता। वह उत्सव, विरोध, बहस, संस्कृति और नागरिक चेतना सबका समुच्चय होता है। कई बार उसे सिर्फ देखना ही नहीं होता। उसे महसूस करना होता है, जीना होता है।
कभी-कभी मै डर भी जाता हूं। पिछले सालों में एक आंदोलन हुआ था – अन्ना का। उसकी आग मुझ तक भी पहुंची थी। बच्चे-बूढ़े, जवान औरते सब जुट गए थे। देश को अन्ना में गांधी बाबा दिखने लगे थे। लगा था देश बदल जाएगा। देश का कूड़़ा-करकट एक झटके में साफ हो जाएगा। लेकिन क्या ऐसा हो पाया ? ये यक्ष प्रश्न है। देश अपनी राह पर फिर चल पड़़ा। इस उम्मीद में कभी तो सुबह होगी।
मैंने कुछ यह भी देखा
ऐसा भी नहीं कि साल भर में मैंने सिर्फ बुराइयां ही देखीं। मैने यहां
- सत्ता का आत्मविश्वास
- जनता के सवाल
- संस्थाओं के बीच संघर्ष
- भविष्य की आकांक्षाएँ
और सबसे बड़ी बात भविष्य को लेकर एक उम्मीद भी देखी। इसीलिए तो मैं कहता हूं कि भारत का लोकतंत्र जीवित है, क्योंकि यहाँ सवाल पूछे जाते हैं, जवाब माँगे जाते हैं और बदलाव की उम्मीद को हमेशा जिंदा रखा जाता है।




