
नई दिल्ली, कंज्यूमर खबर। दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन पार्टनर की नाबालिग बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी की 10 साल की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता और अन्य गवाह अपने बयानों से मुकर भी जाएं, तब भी पितृत्व साबित करने वाले वैज्ञानिक डीएनए साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने दोषी की तरफ से दायर अपील को खारिज कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने उसे पॉक्सो एक्ट की धारा-छह और भारतीय दंड संहिता की धारा 376(दो)(एफ) के तहत दोषी ठहराया था। इस मामले में साल 2017 में एफआईआर दर्ज की गई थी। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी, जो पिछले छह वर्षों से उसकी मां के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था, ने एफआईआर दर्ज होने से लगभग 8 महीने पहले कल्याणपुरी, दिल्ली स्थित उनके घर पर कई बार उसका यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता के अनुसार, आरोपी ने उसकी मां की अनुपस्थिति में उसके साथ दुष्कर्म किया और चाकू दिखाकर जान से मारने की धमकी दी। लगातार यौन शोषण के कारण पीड़िता गर्भवती हो गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2017 को आरोप तय किए और 8 फरवरी 2023 को आरोपी को दोषी करार दिया। इसके बाद उसे 10 साल के कठोर कारावास और 20,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। दोषी की अपील पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने गौर किया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता और उसकी मां दोनों अपने बयानों से मुकर गए थे। पीड़िता ने कोर्ट में कहा कि आरोपी ने उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया। वहीं, आरोपी ने सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अपने बयान में दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पीड़िता का नाबालिग होना और एक बच्चे को जन्म देना निर्विवाद तथ्य हैं। पीठ ने डीएनए रिपोर्ट पर कड़ा भरोसा जताया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही पीड़िता और उसकी मां ने अभियोजन पक्ष के आरोप समर्थन नहीं किया लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि पीड़िता के गर्भधारण के लिए आरोपी जिम्मेदार था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी का पीड़िता की मां के साथ लिव-इन में रहने के कारण पीड़िता तक उसकी पहुंच थी और डीएनए प्रोफाइलिंग ने उसे जैविक पिता के रूप में निर्णायक रूप से स्थापित कर दिया है। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में कोई कमी नहीं है। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आरोपी को दोषी ठहराने वाले ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई ऐसी त्रुटि नहीं है जिसमें इस कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।




