अगर राजनेता के बच्चे नेता बन सकते हैं तो फिर जज के बच्चे कानूनी पेशे में क्यों नहीं आ सकते: हाईकोर्ट
आबकारी नीति मामले की सुनवाई से हटने की अरविंद केजरीवाल व अन्य की याचिकाएं खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि कोई भी मुकदमेबाज यह तय नहीं कर सकता...

Consumer Khabar: आबकारी नीति मामले की सुनवाई से हटने की अरविंद केजरीवाल व अन्य की याचिकाएं खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि कोई भी मुकदमेबाज यह तय नहीं कर सकता कि जज के बच्चों को अपनी जिंदगी कैसे जीनी है, जब तक कि इस बात का कोई सबूत न हो कि जज के पद का गलत इस्तेमाल किया गया है। जस्टिस शर्मा ने कहा कि अगर राजनेताओं के बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, तो यह सवाल उठाना कैसे सही होगा। उन्होंने कहा कि जज के बच्चे या परिवार के लोग कानूनी पेशे में आते हैं तो दूसरों की तरह ही संघर्ष करके खुद को साबित करते हैं। उन्होंने कहा कि इस कोर्ट के रिश्तेदारों का इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। उनका इस मुक़दमे से कोई सीधा संबंध नहीं है। अगर ऐसे आरोप मान लिए जाएंगे, तो कोर्ट ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई नहीं कर पाएगी जिसमें ‘यूनियन ऑफ इंडिया’ एक पक्ष हो। उन्होंने कहा कि इस तरह के आरोप न केवल बेबुनियाद हैं, बल्कि वे न्यायिक पद और उससे जुड़ी ईमानदारी को भी नजरअंदाज़ करते हैं। याचिका खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि आवेदकों की निजी आशंकाए ‘उचित पूर्वाग्रह’ की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई हैं। मामले से खुद को अलग करने का फैसला कानून पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी मनगढ़ंत कहानी पर।
हजार बार दोहराने से झूठ सच नहीं हो जाता: कोर्ट
सुनवाई के दौरान, केजरीवाल ने मौखिक रूप से कहा था कि जस्टिस शर्मा के बच्चों के केंद्र सरकार के साथ पेशेवर जुड़ाव को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा चल रही थी। इस संबंध में, जस्टिस शर्मा ने कहा कि उन्होंने लगभग 34 वर्षों तक जज के रूप में काम किया है और वह सोशल मीडिया पर कही गई किसी भी बात पर ध्यान न देने के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित है। उन्होंने कहा कि कोई झूठ, चाहे उसे कोर्ट में या सोशल मीडिया पर हजार बार भी दोहराया जाए, सच नहीं बन जाता। सच अपनी ताकत सिर्फ इसलिए नहीं खो देता कि झूठ को बार-बार दोहराया जा रहा है।
जज को किसी आरोपी के कहने पर अग्निपरीक्षा क्यों देनी चाहिए: कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने कहा कि मनीष सिसोदिया की ओर से पेश अधिवक्ता संजय हेगड़े ने एक बहुत ही बेहतरीन दलील दी थी कि माता सीता को एक बार नहीं, बल्कि दो बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी लेकिन लेकिन, अगर कोई ऐसा आरोपी जिसके खिलाफ आरोप पहले ही हटाए जा चुके हैं इस कोर्ट से अग्नि परीक्षा देने की मांग करता है, तो इस कोर्ट को पलटकर यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि आख़िर एक जज को सिर्फ किसी आरोपी के कहने पर अग्नि परीक्षा क्यों देनी चाहिए। क्या सिर्फ इसलिए कि उस आरोपी को यह डर है कि जज का फ़सला उसके पक्ष में नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि मेरी निष्पक्षता और तटस्थता पर संदेह और आरोप लगाने वाली याचिका साक्ष्यों के साथ नहीं, बल्कि मेरी भूमिका से हटने की मांग के साथ दायर की गई थी।
नेता को अपनी हद पार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती: कोर्ट
जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी राजनेता को अपनी हद पार करने की इजाजत नहीं दी जा सकती और न ही वह किसी जज की न्यायिक काबिलियत पर सवाल उठा सकता है। अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में शामिल होने के आरोपों पर कोर्ट ने कहा कि वे कार्यक्रम राजनीतिक नहीं थे। वक्ताओं को कानूनी मुद्दों पर बोलने के लिए बुलाया गया था। पहले भी इस देश के कई जज ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेते रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि मुझे भाषण देने के लिए बुलाया गया था, यह राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाने का आधार नहीं हो सकता। बार (वकीलों) और बेंच (जजों) के बीच का रिश्ता सिर्फ़ कोर्टरूम तक ही सीमित नहीं होता। किसी भी केस लड़ने वाले को बार और बेंच के बीच के रिश्ते पर सवाल उठाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
केजरीवाल की रणनीति पर कोर्ट का सवाल
जस्टिस शर्मा ने कहा कि आवेदक ने अपने लिए ‘विन-विन’ या कैच-22 की स्थिति बना ली है। यदि कोर्ट खुद को अलग करती है तो उसके दावे सही ठहरेंगे, और यदि नहीं करती है तो वह फिर भी फैसले पर सवाल उठा सकता है। उन्होंने ने कहा कि ऐसी रणनीतियों की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया और संस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ने का खतरा है। जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मामले में मुझे ऐसी स्थिति में रखा गया है कि यदि मैं खुद को अलग करती हूं तो क्या होगा और यदि नहीं करती हूं तो क्या होगा। अगर उसे राहत नहीं मिलती है, तो वह कहेगा कि उसने पहले ही परिणाम का अनुमान लगा लिया था। अगर उसे राहत मिलती है, तो वह कह सकता है कि कोर्ट ने दबाव में आकर फैसला किया।
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