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सहकार बना समृ्द्धि की नई पहचान

सहकारिता की सफलता केवल सरकारी नीतियों पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगी कि स्थानीय स्तर पर सदस्य कितने सक्रिय, जागरूक और जिम्मेदार हैं। यदि सरकार के प्रयासों को जमीनी स्तर की भागीदारी और पारदर्शिता के साथ जोड़ा जाए, तो 'सहकार से समृद्धि' केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक हकीकत बन सकता है...

Consumer Khabar: भारत में सहकारिता  का विचार केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक न्याय का एक सशक्त माध्यम रहा है। ग्रामीण भारत में यह आंदोलन किसानों, मजदूरों और छोटे उद्यमियों के लिए आत्मनिर्भरता का आधार बना। अमूल, इफको और कर्नाटक मिल्क फेडरेशन जैसे उदाहरण इसकी सफलता के प्रमाण हैं।

मौजूदा केंद्र सरकार (विशेषकर 2014 के बाद और 2021 में सहकारिता मंत्रालय के गठन के बाद) ने सहकारिता को ‘सहकार से समृद्धि’ के नारे के साथ नए सिरे से परिभाषित किया है।

पहला बड़ा कदम:

जुलाई 2021 में केंद्र सरकार ने पहली बार एक अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन किया। इसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं को मजबूत करना और उन्हें राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाना था। इससे सहकारिता को एक संस्थागत पहचान मिली, नीति निर्माण और कार्यान्वयन में केंद्रीय समन्वय बढ़ा और केंद्र सरकार की दृष्टि के अनुरूप विभिन्न मंत्रालयों के साथ तालमेल संभव हो पाया।

हालांकि, सहकारिता राज्य सूची का विषय है,  इसलिए कई राज्यों ने इसे संघीय ढांचे में हस्तक्षेप के रूप में देखा। कुछ विशेषज्ञों ने भी माना कि इससे सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

दूसरा बड़ा कदम:

मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी (संशोधन) अधिनियम, 2023 रहा। सरकार ने मल्टी-स्टेट सहकारी समितियों के कामकाज को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए इसमें संशोधन किया। इसके प्रमुख प्रावधानों में सहकारी चुनाव प्राधिकरण और सहकारी संस्थाओं के लिए लोकपाल की व्यवस्था शामिल थी। इसमें महिलाओं और अनुसूचित वर्गों के लिए आरक्षण  के साथ बोर्ड के सदस्यों की जवाबदेही बढ़ाने के प्रावधान शामिल थे। इससे पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बढ़ावा मिला, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन पर नियंत्रण की कोशिश की गई एवं समावेशिता  को बढ़ावा मिला। हां, यहां केंद्रीय नियंत्रण बढ़ने की आशंका और छोटे सहकारी संगठनों के लिए नियमों के अनुपालन में जटिलता और खर्च के सवाल भी उठे।

तीसरा बड़ा कदम:

डिजिटल सहकारिता और तकनीकी नवाचार से जुड़ा है। सरकार ने सहकारी क्षेत्र को डिजिटल बनाने पर जोर दिया है। इस दृष्टि से PACS (Primary Agricultural Credit Societies) का कंप्यूटरीकरण, सहकारी संस्थाओं को डिजिटल बैंकिंग सिस्टम से जोड़ना और राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस का निर्माण शामिल है। पारदर्शिता और कार्यकुशलता में सुधार के अलावा, किसानों को सीधे लाभ  मिलने में आसानी एवं वित्तीय समावेशन को बढ़ावे के रूप में देखने के मिला।

PACS का पुनरुद्धार और बहु-उद्देश्यीय विस्तार इस सरकार का महत्वपूर्ण प्रयास रहा है। सरकार ने PACS को केवल ऋण देने वाली संस्था से आगे बढ़ा कर मल्टी-फंक्शनल यूनिट बनाने की योजना बनाई है। इस लिहाज से PACS को Common Service Center (CSC)  के रूप में विकसित करना, खाद, बीज, भंडारण और मार्केटिंग सेवाएं प्रदान करना एवं लगभग 63,000 PACS का आधुनिकीकरण जैसे प्रयास शामिल हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली, किसानों को एक ही स्थान पर कई सेवाएं मिलना संभव हो पाया और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई।

सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में सुधार भी उल्लेखनीय है। सरकार ने सहकारी बैंकों को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं जैसे, सहकारी बैंकों को RBI के दायरे में लाना, बैंकिंग विनियमन अधिनियम में संशोधन एवं जमाकर्ताओं की सुरक्षा के लिए नियमों को सख्त करना। इससे बैंकिंग प्रणाली में लोगों का विश्वास बढ़ा है, धोखाधड़ी के मामलों में कमी आने की संभावना के साथ वित्तीय स्थिरता देखने को मिल रही है।

सरकार ने सहकारी क्षेत्र को वैश्विक बाजार से जोड़ने के लिए नई संस्थाओं का गठन किया। इनमें, National Cooperative Exports Limited (NCEL), National Cooperative Organics Limited (NCOL) और Bharatiya Beej Sahakari Samiti Limited (BBSSL) जैसी संस्थाएं शामिल हैं।

मौजूदा सरकार के सहकारी प्रयासों में महिला और कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण संबंधी कोशिशें काफी महत्वपूर्ण हैं। इस दृष्टि से महिला सहकारी समितियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, स्वयं सहायता समूह (SHGs) और सहकारिता के बीच तालमेल और आरक्षण संबंधी प्रावधानों को लागू किया जा रहा है।

सरकार ने सहकारिता को ‘आत्मनिर्भर भारत’  मिशन से भी जोड़ा है जिसमें कृषि, डेयरी, मत्स्य और हस्तशिल्प क्षेत्रों में सहकारी मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है साथ ही स्थानीय उत्पादन और विपणन को बढ़ावा दिया जा रहा है। कुछ राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक) में सहकारिता मजबूत है, जबकि अन्य राज्यों में कमजोर। इसमें संतुलन लाने की कोशिश भी जारी है।

कहा जा सकता है कि, सहकारिता की सफलता केवल सरकारी नीतियों पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगी कि स्थानीय स्तर पर सदस्य कितने सक्रिय, जागरूक और जिम्मेदार हैं। यदि सरकार के प्रयासों को जमीनी स्तर की भागीदारी और पारदर्शिता के साथ जोड़ा जाए, तो ‘सहकार से समृद्धि’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक हकीकत बन सकता है।

 

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