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सहकारी आंदोलन के वैचारिक अग्रदूत

भारत में सहकारिता का विकास एक सतत प्रक्रिया रही है। एक वैचारिक दर्शन से लेकर सामूहिक शक्ति के परिणामों तक सहकारिता अलग-अलग रूपों में सामने आई...

Consumer khabar: भारत में सहकारिता का विकास एक सतत प्रक्रिया रही है। एक वैचारिक दर्शन से लेकर सामूहिक शक्ति के परिणामों तक सहकारिता अलग-अलग रूपों में सामने आई। आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री ने सहकारी शक्ति को ग्रामीण भारत के विकास इंजन की तरह से देखा। ऑपरेशन फ्लड सहकारी ताकत का पहला उत्कृष्ट उदाहरण बना। मौजूदा समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सहकारिता की शक्ति को लेकर बहुत आशान्वित हैं। उन्होंने सहकारिता के लिए अलग से मंत्रालय का गठन करने के साथ उसका जिम्मा गृहमंत्री अमित शाह को सौंपा।

पारस्परिक सहायता से स्वयं सहायता
भारत में सहकारी आंदोलन के वैचारिक अग्रदूत के रूप में सर फ्रेडरिक निकोलसन को माना जाता है। उन्होंने किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए 1904 में सहकारिता (क्रेडिट समितियों) की नींव रखी। उनका दर्शन ‘पारस्परिक सहायता द्वारा आत्म-सहायता’ पर आधारित था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समानता और समावेशी विकास लाना था।

मूल उद्देश्य :निकोलसन ने स्पष्ट किया था कि भारत में सहकारिता का अर्थ केवल उधार देना नहीं, बल्कि किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त कर आत्मनिर्भर बनाना है।

आत्म-सहायता का सिद्धांत: उन्होंने जोर दिया कि सहकारी संस्थाओं को बाहरी सरकारी मदद पर निर्भर न रहकर, सदस्य के योगदान और परस्पर सहयोग पर आधारित होना चाहिए।

प्रजातांत्रिक प्रबंधन:सहकारिता में प्रत्येक सदस्य को, चाहे उनके अंश कितने भी हों, केवल एक मत देने का अधिकार होना चाहिए, जो इसके लोकतांत्रिक स्वरूप को दर्शाता है।

सीमांत ऋण व साख:उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में साख की कमी को दूर करने के लिए छोटे स्तर की ऋण समितियों की वकालत की।

आत्मनिर्भरता एवं सामूहिक प्रयास का प्रतीक
भारत में सहकारिता से जुड़ी श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन  थे। उन्हें ‘मिल्कमैन ऑफ इंडिया’ के रूप में भी जाना जाता है। सहकारिता और ग्रामीण विकास के प्रति उनके विचार क्रांतिकारी और दूरदर्शी थे।

डॉ. कुरियन के सहकारिता के बारे में प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं

किसानों का सशक्तिकरण :डॉ. कुरियन का मानना था कि सहकारिता केवल दूध बेचने का माध्यम नहीं, बल्कि छोटे और सीमांत किसानों के सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली उपकरण है। वे सहकारी समितियों को ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘सामूहिक प्रयास’ का प्रतीक मानते थे।

बिचौलियों का अंत :उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक उत्पादक (किसान) अपनी उपज के विपणन को स्वयं नियंत्रित नहीं करेंगे, तब तक वे बिचौलियों द्वारा शोषित होते रहेंगे। उन्होंने अमूल के माध्यम से ‘उत्पादक-स्वामित्व’ मॉडल को स्थापित किया।

लोकतांत्रिक नियंत्रण :कुरियन सहकारिता में किसानों की पूर्ण भागीदारी और लोकतांत्रिक प्रबंधन के समर्थक थे। उनका मानना था कि सहकारी समितियों को सरकारी हस्तक्षेप और राजनीति से मुक्त होना चाहिए, और उन्हें केवल अपने सदस्य-किसानों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

व्यावसायिकता के साथ मानवीय दृष्टिकोण :वे सहकारिता के मूल मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए, आधुनिक प्रबंधन और तकनीक को अपनाने पर जोर देते थे। उनके अनुसार, ‘व्यापार का उद्देश्य लाभ कमाना होना चाहिए, लेकिन सहकारिता में वह लाभ उत्पादकों के कल्याण में लगना चाहिए’।

आणंद पैटर्न :उन्होंने ‘आणंद पैटर्न’ विकसित किया, जो गांव-स्तरीय सहकारी समितियों, जिला-स्तरीय संघों और राज्य-स्तरीय महासंघों का एक त्रि-स्तरीय ढांचा है। यह मॉडल उत्पादक-स्वामित्व और पेशेवर प्रबंधन के संतुलन पर आधारित है।

अंतिम आशा :डॉ. कुरियन का प्रसिद्ध कथन था ‘जहां सहकारिता विफल होती है, वहां ग्रामीण भारत की एकमात्र आशा भी विफल हो जाती है।’ वे मानते थे कि भारतीय किसानों के लिए सहकारिता ही विकास का एकमात्र सच्चा रास्ता है।

डॉ. कुरियन के लिए सहकारिता केवल एक आर्थिक ढांचा नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक चेतना का एक जरिया थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण उत्पादकों को स्वाभिमानी बनाना था।

नैतिक एवं सामाजिक परिवर्तन का माध्यम
गांधी जी सहकारिता को केवल एक आर्थिक प्रणाली नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि सहकारी खेती और उद्योग ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर (ग्राम स्वराज) बना सकते हैं, जिससे गरीबी और शोषण का अंत होगा और सामुदायिक भावना को बढ़ावा मिलेगा।

सहकारी खेती :गांधी जी का मानना था कि छोटे किसानों को अपनी ज़मीनें मिलाकर संयुक्त स्वामित्व के साथ खेती करना चाहिए। इससे श्रम, पूंजी और औजारों की बचत होती है।

आत्मनिर्भर ग्राम :वे ग्रामीण उद्योगों, विशेषकर खादी और कुटीर उद्योगों को सहकारी आधार पर विकसित करने के समर्थक थे, ताकि गांव के संसाधन गांव में ही उपयोग हों।

नैतिक आधार :गांधी जी के अनुसार, सहकारिता का उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, बल्कि सदस्यों का नैतिक उत्थान और सामुदायिक सेवा होना चाहिए।

शोषण से मुक्ति :उनका दृढ़ विश्वास था कि सहकारिता के माध्यम से किसान और मजदूर जमींदारों व साहूकारों के शोषण से मुक्त हो सकते हैं।

विकेंद्रीकरण :गांधीवादी समाजवादी दर्शन में सहकारी समितियां सत्ता के विकेंद्रीकरण और आम लोगों को सशक्त बनाने का प्रमुख तरीका थीं। गांधीजी के लिए, सहकारिता का अर्थ ‘मिलजुल कर, ईमानदारी से और निःस्वार्थ भाव से कार्य करना’ था।

सहकार से समृद्धि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के विकास में सहकारिता को एक प्रमुख स्तंभ मानते हैं, जिसे वे सहकार से समृद्धि  के मंत्र के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, सहकारी समितियां केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक विकास, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत का आधार हैं, जो गांव, गरीब और किसानों को सीधे सशक्त बनाती हैं।

दर्शन और पहल :

अलग मंत्रालय का गठन :मोदी सरकार ने सहकारिता क्षेत्र को मजबूती देने के लिए 2021 में एक अलग ‘सहकारिता मंत्रालय’ स्थापित किया।

सहकार से समद्धि :उनका मानना है कि सहकारी मॉडल ग्रामीण समुदायों को समृद्ध बनाने का सबसे समावेशी तरीका है।

उनका मानना है कि सहकारी समितियों को ‘आत्मनिर्भर भारत’ और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने के लिए एक प्रेरक शक्ति बनना चाहिए।

सहकारिता लोकतंत्र का स्तंभ
जवाहरलाल नेहरू सहकारिता को भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास का एक प्रमुख माध्यम मानते थे। उन्होंने सहकारिता को लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक (अन्य दो पंचायत और स्कूल) माना। नेहरू जी के लिए, सहकारिता केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि यह समाजवादी समाज की स्थापना, ग्रामीण सशक्तिकरण और संघर्ष से सहयोग की ओर बढ़ने का एक साधन थी।

लोकतंत्र और समाजवाद का आधार:नेहरू का मानना था कि सहकारिता, लोकतंत्र और समाजवाद दोनों के सबसे करीब है। यह छोटे किसानों और श्रमिकों को संगठित होकर अपनी स्थिति सुधारने का अधिकार देती है।

ग्रामीण आत्मनिर्भरता :वे सहकारी खेती के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि छोटे खेतों को मिलाकर की गई सामूहिक खेती से उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की स्थिति में सुधार होगा।

विकास के तीन स्तंभ :नेहरू ने सहकारिता को पंचायत और स्कूल के साथ भारतीय ग्रामीण जीवन के पुनर्निर्माण के लिए एक आवश्यक संस्था माना।

शहरी-ग्रामीण सहयोग :नेहरू के अनुसार, सहकारी समितियां केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच आर्थिक सेतु का काम भी करनी चाहिए।

औद्योगिक और कृषि क्षेत्र : उन्होंने कृषि के साथ-साथ लघु एवं कुटीर उद्योगों में भी सहकारिता को बढ़ावा देने पर जोर दिया ताकि समावेशी विकास हो सके।

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