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भारत में हाई बीपी से हर साल 16 लाख मौतें : एम्स

 भारत में उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) तेजी से देश की सबसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नई दिल्ली के विशेषज्ञों ने इसे “साइलेंट किलर” बताते हुए चिंता...

Consumer Khabar : भारत में उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) तेजी से देश की सबसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नई दिल्ली के विशेषज्ञों ने इसे “साइलेंट किलर” बताते हुए चिंता जताई है कि इससे होने वाली मौतों की संख्या अब देश में संक्रामक रोगों से होने वाली कुल मौतों से भी अधिक हो चुकी है। एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंबुज रॉय ने देश में बढ़ते हाइपरटेंशन संकट को लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि हाई बीपी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाता रहता है और हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेलियर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनता है।

एचआईवी से 40 से 50 हजार मौतें 

आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 16 लाख लोगों की मौत हाई ब्लड प्रेशर के कारण होती है। यानी औसतन रोजाना करीब 4,400 लोग इस बीमारी की वजह से जान गंवा रहे हैं। डॉ. रॉय के मुताबिक, हाई बीपी से होने वाली मौतें टीबी, एचआईवी, डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से कहीं ज्यादा हैं। जहां टीबी से सालाना लगभग 3 से 3.3 लाख लोगों की मौत होती है, वहीं एचआईवी से 40 से 50 हजार मौतें दर्ज की जाती हैं। इसके बावजूद हाई बीपी से मौतों का आंकड़ा इन सभी बीमारियों से कहीं ऊपर है।

ग्रामीण भारत में हर चार में से एक और शहरी क्षेत्रों में हर तीन में से एक वयस्क हाई बीपी का शिकार
देश में हाइपरटेंशन की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। ग्रामीण भारत में हर चार में से एक वयस्क और शहरी क्षेत्रों में हर तीन में से एक वयस्क हाई बीपी का शिकार है। अनुमान है कि देश में करीब 30 करोड़ लोग उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, खराब जीवनशैली इस समस्या का सबसे बड़ा कारण बन रही है। जरूरत से अधिक नमक का सेवन, फल और सब्जियों की कमी, मोटापा, शारीरिक गतिविधियों में कमी, तनाव, वायु प्रदूषण, खराब नींद और शराब का सेवन हाई बीपी के प्रमुख कारण हैं।

व्यापक स्तर पर स्क्रीनिंग, समय पर इलाज और लोगों में जागरूकता जरुरी
डॉ. अंबुज रॉय ने कहा कि इस बढ़ते खतरे को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर स्क्रीनिंग, समय पर इलाज और लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। उनका कहना है कि यदि समय रहते जीवनशैली में सुधार और नियमित जांच पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

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