नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार: आत्मसमर्पण, गिरफ्तारियां और विकास से बदली तस्वीर
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के रणनीतिक नेतृत्व, स्पष्ट नीति और बहुस्तरीय दृष्टिकोण के चलते देश में नक्सलवाद का खात्मा हो गया...


-शशिकांत उपाध्याय
Consumer Khabar: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के रणनीतिक नेतृत्व, स्पष्ट नीति और बहुस्तरीय दृष्टिकोण के चलते देश में नक्सलवाद का खात्मा हो गया। 31 मार्च, 2026 की तारीख उन्होंने तय की थी और 30 मार्च को ही संसद में अपने वक्तव्य के माध्यम से पूरे देश को सुखद सूचना दी कि देश अब नक्सलवाद के दंश से मुक्त हो गया है।
केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों और आपसी समन्वय से सुरक्षा, विकास और पुनर्वास को साथ लेकर चलने की उनकी रणनीति ने जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम दिए हैं। क्रमवार तरीके से हिंसा में ऐतिहासिक गिरावट आई है, जबकि आत्मसमर्पण और गिरफ्तारियों के आंकड़ों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। कड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 के उच्च स्तर की तुलना में 2024 तक नक्सली घटनाओं में लगभग 80 प्रतिशत और मौतों में करीब 85 प्रतिशत की कमी आई है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी 126 से घटकर केवल 38 रह गई है। यह परिवर्तन किसी एक पहल का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुविचारित और लगातार लागू की गई रणनीति का नतीजा है।
हाल के वर्षों में यह सुधार और तेज हुआ है। वर्ष 2019 से 2024 के बीच हिंसक घटनाएं 501 से घटकर 374 हो गईं, जो लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाती हैं। इसी अवधि में नागरिकों और सुरक्षाबलों की मौतें 202 से घटकर 150 सालाना रह गईं। यह संकेत है कि न केवल घटनाएं कम हुई हैं, बल्कि उनकी तीव्रता और प्रभाव भी घटा है।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव नक्सलियों के व्यवहार में आया है। अब बड़ी संख्या में उग्रवादी मुख्यधारा में लौट रहे हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में 290 नक्सली मारे गए, जबकि 1,090 गिरफ्तार हुए और 881 ने आत्मसमर्पण किया। वहीं 2025 में (सितंबर तक) 270 मारे गए, 680 गिरफ्तार हुए और 1,225 ने आत्मसमर्पण किया। यह तथ्य अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि सरकार की नीति का असर सीधे जमीनी कैडरों पर पड़ा है। वे हथियार छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटने लगे। यह बदलाव केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई का परिणाम नहीं है, बल्कि “विकास के साथ विश्वास” की नीति का भी असर है। अमित शाह की अगुवाई में अपनाई गई रणनीति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नक्सलवाद का समाधान केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विकास, संवाद और पुनर्वास के संतुलित प्रयासों से ही संभव है।
छत्तीसगढ़, जो कभी नक्सलवाद का गढ़ माना जाता था, वहां भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वर्ष 2024 में जहां 290 नक्सली मारे गए, वहीं 1,000 से अधिक ने आत्मसमर्पण किया। बस्तर क्षेत्र में तो समूह के समूह आत्मसमर्पण कर रहे हैं। दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ (DKAMS) से जुड़े 200 से अधिक कैडरों ने एक साथ आत्मसमर्पण कर संविधान के प्रति आस्था जताई—यह बदलाव का एक ऐतिहासिक प्रतीक माना जा रहा है।
सरकार की पुनर्वास योजनाओं का भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आत्मसमर्पण करने वाले कई पूर्व उग्रवादी अब “बस्तर कैफे” जैसे उद्यम चला रहे हैं, वहीं कुछ “बस्तर फाइटर्स” के रूप में सुरक्षा बलों में शामिल होकर समाज की सेवा कर रहे हैं।
सुरक्षा बलों की कार्रवाई में भी बड़ी सफलता मिली है। शीर्ष माओवादी नेतृत्व का तेजी से सफाया हुआ है। हाल ही में CPI (माओवादी) के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू को मार गिराया गया। पिछले चार वर्षों में केंद्रीय समिति के 18 से अधिक सदस्य मारे गए या गिरफ्तार हुए हैं। इससे संगठन की कमर टूट चुकी है।
विकास कार्यों ने भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर बदल दी है। सरकार की “क्लियर, होल्ड एंड डेवलप” रणनीति के तहत सुरक्षा के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विस्तार हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में 8,300 किलोमीटर से अधिक नई सड़कें बनाई गई हैं, जबकि 2014 से अब तक कुल 14,618 किलोमीटर सड़क निर्माण हुआ है। दूरसंचार क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है—7,768 मोबाइल टावर स्थापित किए गए हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों में 4G कनेक्टिविटी पहुंची है।
बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करते हुए 1,007 नई बैंक शाखाएं और 937 एटीएम खोले गए हैं। साथ ही हजारों बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट गांव-गांव में सेवाएं दे रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में 95 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, 46 आईटीआई और 49 कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के तहत 186 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले गए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हजारों पक्के घर बनाए गए हैं, जिससे आदिवासी क्षेत्रों में लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। वहीं 596 आधुनिक पुलिस थाने स्थापित कर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है।
सुरक्षा अभियानों में भी बड़ा बदलाव आया है। सरकार ने सुरक्षा बलों को पूरी ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी है, जिससे त्वरित और प्रभावी कार्रवाई संभव हो पाई है। मल्टी-एजेंसी समन्वय, आधुनिक तकनीक, ड्रोन निगरानी और खुफिया नेटवर्क के कारण नक्सली गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। वहीं, एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियों ने नक्सलियों की फंडिंग पर कड़ा प्रहार किया है। हथियारों की आपूर्ति और वित्तीय नेटवर्क को काफी हद तक ध्वस्त कर दिया गया है।
आज जब नक्सल हिंसा सिमट रही है और आत्मसमर्पण के आंकड़े बढ़ रहे हैं, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि देश नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ रहा है—और इस बदलाव के केंद्र में है एक स्पष्ट दृष्टि, मजबूत इच्छाशक्ति और ठोस रणनीतिक नेतृत्व।
-लेखक सीआरपीएफ में आईजी रह चुके हैं।




